✦ High Court of India · 10 Dec 2025

C.B.I v. Daya Shankar Yadav), R.C. No

Case Details High Court of India · 10 Dec 2025
Court
High Court of India
Decided
10 Dec 2025
Length
5,087 words

Cited in this judgment

2. Heard Sri Avinash Kumar Srivastava, the learned counsel for the applicant and Sri Anurag Kumar Singh, the learned counsel for the opposite party/C.B.I. as well as perused the record.

3. The instant application has been filed challenging the order dated 10.07.2024 passed by the Special Judicial Magistrate Pollution/C.B.I., Lucknow (in short "Magistrate") in Case No. 01/2013 (C.B.I. vs. Daya Shankar Yadav), R.C. No.0532012S0007, under Section(s)- 465, 468, 471 and 420 read with 511 IPC, whereby the Magistrate rejected the application preferred by the applicant seeking discharge and also the order dated 31.01.2025 passed by the Special Judge (Prevention of Corruption Act)/C./B.I., Court No. 3, Lucknow (in short the "Revisional Court") in Criminal Revision No. 489/2024 (Daya Shankar Yadav vs. State/C.B.I.) instituted in terms of Section- 438/440 B.N.S.S., 2023, akin to Section 397/399 Cr.P.C. (now repealed), whereby the Revisional Court dismissed the said revision filed by the applicant challenging the order dated 10.07.2024 passed by the Magistrate and affirmed the said order.

4. The main relief(s) sought in the instant application are extracted hereunder:- "Wherefore, it is most humbly prayed that this Hon'ble Court may be pleased to set-aside the impugned order dated 31.01.2025, passed by Learned Special Judge (Prevention of Corruption Act)/C.B.I., Court No. 3, Lucknow in Criminal Revision No. 489 of 2024, Daya Shankar Yadav Vs. C.B.I., as well as impugned order dated 10.07.2024, passed by Learned Special Judicial Magistrate Pollution/C.B.I., Lucknow, as contained in Annexure No. 1 and 2 to this application, in the interest of justice. It is further prayed that this Hon'ble Court may also be pleased to allow 2 A482 No. 2090 of 2025 the discharge application, quashing the proceedings of Case No. 01 of 2013 (R.C. No. 053201250007/2012) С.В.I. Vs. Daya Shankar Yadav, pending the court of Learned Special Judicial Magistrate Pollution/C.B.I., Lucknow, U/s. 465, 468, 471, 420 r/w 511 I.P.C., Police Station-CBI/ SCB, Lucknow, in the interest of justice."

5. Brief facts of the case are as under:- (i) On a complaint received from the Registrar of this Court vide Letter No. 6195 dated 27.08.2012 enclosing therewith a certified copy of the order dated 23.08.2012 passed by this Court in Writ Petition No. 9 (Ceiling) of 2012 (Suraj Lal and others vs. State of UP and others), whereby this Court directed the C.B.I. to investigate the matter as to who are the persons involved in preparation and filing of forged and fabricated order dated 03.02.2011, which has been brought on record by the contesting respondent by filing counter affidavit before Tehsildar, Kaiserganj, District- Bahraich, an FIR/Case Crime No. 0532012S0007 was registered at Police Station- CBI/SCB, District- Lucknow on 06.09.2012. (ii) The opposite party/C.B.I. thereafter carried out the investigation and submitted the charge sheet against the applicant before the competent court of jurisdiction namely Special Judicial Magistrate (Pollution)/C.B.I., Lucknow. (iii) Alongwith the charge sheet, the C.B.I. filed the photocopy of the alleged order dated 03.02.2011, a copy of which is annexed as Annexure No. 10 at page 151 to 152 of the paper book, passed in Writ Petition No. Nill (M/S) of 2011 filed by Mata Prasad s/o Ram Harakh, Budh Ram s/o Sattan, Sita Ram s/o Sattan, Suraj Lal s/o Ram Jiyawan, Sukl Lal s/o Daya Ram, Kusum w/o Ram Autar and Ram Pratap s/o Hridya impleading therein four official respondents and one private opposite party namely Shri Hari Saran Singh. (iv) It is to be noted that the copy of the order dated 03.02.201, on record, only bears the seal of Oath Commissioner. In other words, this order does not bear the seal of this Court. (v) It is also to be noted that the FIR/RC No. 0532012S0007 was lodged against unknown persons. (vi) From the record and also the submissions advanced by the parties' counsel before this Court, it appears that the statement(s) of the beneficiaries, named above, who filed the affidavit(s) before C.B.I. were recorded by the C.B.I. and based upon their statement(s), which includes Forensic Science Examination according to which the copy of the order dated 03.02.2011 was provided by the applicant, treating it to be a gospel truth, exonerated the beneficiaries of the order dated 03.02.2011 and filed the charge sheet only against the present applicant based upon the photocopy of order, which does not bear the seal of this Court. (vii) The record also indicates that C.B.I. while filing the charge-sheet did not verify as to whether the order was typed from the computer or typewriter belonging to the present applicant, which according to learned 3 A482 No. 2090 of 2025 counsel for the applicant, is required to connect the applicant with the crime indicated in the FIR.

6. In the aforesaid factual background of the case, the application seeking discharge was filed before the Magistrate, which was rejected vide impugned order dated 10.07.2024. The relevant portion of order dated 10.07.2024 is extracted hereinunder:- "प्ऴावली के अवलोकन से यह िविदत होता है िक ्ऺस्तुत वाद RC 7(S)/2012 माननीय उच्च न्यायालय, खण्डपीठ लखनऊ, लखनऊ, में W.P. 92 (Ceiling)/'2009 में पािरत आदेश िदनांिकत 23.08.2012 के अनु्वम में सी०बी०आई० ्षारा अिभयु्व दयाशंकर यादव के िवरु्ध अपराध सं०-01/2013, 465,468,471 एवं 420 r/w-511 भा०द०सं० के अंतगर्त ्ऺथम सूचना िरपोटर् पंजीकृ त कर, अन्वेषण की कायर्वाही संपािदत की गयी। अन्वेषण के दौरान साष्य संकलन के उपरान्त िववेचक ्षारा ्ऺकरण में अिभयु्व के िवरु्ध धारा- 465,468,471 एवं 420 r/w-511 भा०दं०सं० के अंतगर्त आरोप प्ऴ ्ऺेिषत िकया गया, िजस पर न्यायालय ्षारा अपने आदेश के माध्यम से ्ऺकरण का ्ऺसं्ञान िलया गया। परशुराम ने िदनांक 19.11.2011 को थाना िदवस पर एक हस्तिलिखत प्ऴ ्ऺस्तुत िकया। माननीय न्यायमूित ए.एन.वमार् के िदनांक 03.02.2011 के जाली और मनगढ़ंत आदेश की ्ऺित के साथ ्ऺस्तुत िकया गया है, िजसमें दावा िकया गया है िक िजस भूिम पर प्टेदार कािबज थे, उसके हस्तांतरण पर रोक है। उ्व प्ऴ िदनांिकत 19.11.2011 ्शी परशु राम पु्ऴ ितलक ( प्टेदार) ्षारा प्टेदारों की ओर से िलखा गया था और इसमें उनके हस्ता्षर के अलावा 08 प्टेदारों अथार्त् ्शी के दार, पारसरम पु्ऴ ्ऺभु, माता ्ऺसाद, अवधेश, ननकू , बच्चा लाल, सूयर् लाल और ्शीमती दयावती के अंगूठे के िनशान हैं, जो नायब तहसीलदार ्षारा जारी नोिटस से ्ऺभािवत थे। ्ऺाथर् / अिभयु्व पर माननीय उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ, लखनऊ का जाली और मनगढंत आदेश तैयार करने और दािखल करने का आरोप है। वस्तुतः अिभयु्व की दोिषता या अन्यथा के बारे में िनष्कषर् अिभिलिखत करने के पूवर् परी्षण और िनणर्य का जो मानक लागू िकया जाना होता है, उसे आरोप िवरचन अथवा उन्मोचन के दौरान िविना्य करने के ्ऺ्वम पर ठीक-ठाक लागू नहीं िकया जाता है। अिपतु इस ्ऺ्वम पर न्यायालय को मुख्यतः यह देखना होता है िक ्ऺथम दृ्िया मामला बनता है अथवा नहीं। इस स्तर पर न्यायालय का ्ऺयोजन इस बात से आ्षस्त होना है िक न्यायालय का समाधान हो जाए िक अिभयोग तुच्छ नहीं है और अिभयु्व के िवरु्ध कायर्वाही िकए जाने के िलए कु छ र््व िववेचन एवं साम्षी मौजूद है। ्ऺश्नगत ्ऺकरण के तथ्यों एवं पिरिस्थितयों में एवं उपयु िव्शेषण के आधार पर यह ्ऺमािणत नहीं होता है िक ्ऺश्नगत ्ऺकरण में ्ऺाथर्/अिभयु्व के िवरु्ध कायर्वाही करने का पयार्त आधार नहीं है। ऐसी िस्थित में ्ऺश्गत ्ऺकरण के तथ्यों एवं पिरिस्थितयों में ्ऺाथर् / अिभयु्व को इस स्तर पर उन्मोिचत िकया जाना न्यायोिचत नहीं होगा। जहां तक ्ऺाथर्ना प्ऴ में उिल्लिखत अन्य िबन्दुओं के सापे्ष ्ऺस्तुत िव्षान अिधव्वा का तकर् है , तो उ्व तथ्य इस स्तर पर िनष्किषत नहीं हो सकते हैं, अिपतु अिभयोजन साष्य के उपरान्त ही देखा जा सकता है। यह स्प्ि है िक वतर्मान में उभयप्षों के साष्य अभी अंिकत नहीं हुए हैं, अिभयु्व के िवरु्ध आरोप भी अभी िवरिचत नहीं हुए हैं। यह सुस्थािपत िस्धान्त है िक इस स्तर पर संि्षत िवचारण नहीं िकया जाना है और यह देखा जाना है िक क्या ्ऺथम दृ्िया साष्य साशय इस ्ऺकार का है, जो आरोप बनाए जाने के िलए पयार्प्त है। इस मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय के ्षारा यह सुस्थािपत रूप से अवधािरत िकये गया है िक आरोप बनाने के िलए साष्य इस ्ऺकार के हों िक आरोप बनाया जा सके । सज्जन कु मार बनाम सी.बी.आई. 2010 (9) एस.सी.सी. 368 के ्ऺकरण में भी माननीय उच्चतम न्यायालय ्षारा उपरो्व सन्दभर् में यह अिभमत िदया गया है िक "आरोप िवरिचत िकये जाते समय या उन्मोचन के समय न्यायालय को समस्त तथ्यों एवं साष्यों का िव्शेषण नहीं करना है, साष्य के मूल और 4 A482 No. 2090 of 2025 िव्षसनीयता का िनधार्रण िवचारण के समय िकया जायेगा।" िविध ्िवस्था कान्ती भ्शा शाह बनाम पि्ाम बंगाल राज्य ए.आई.आर 2000 एस.सी. 522 में माननीय उच्चतम न्यायालय ्षारा यह मतािभवाि्व करते हुए िनणर्त िकया गया है िक "आरोप िविचत िकये जाने के िलए ्ऺथम दृष््िा के स डायरी व अन्य ्ऺप्ऴों के आधार पर यिद अिभयु्वगण ्षारा अपराध कािरत िकये जाने की उपधारणा उत्पन्न होती है तो आरोप िवरिचत िकया जा सकता है, परन्तु उन्मोचन िकये जाने हेतु पयार्प्त कारण दिशत करना आवश्यक है।" माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ्षारा अपने न्याय िनणर्यन उमेश िसह एवं अन्य बनाम उ्तर ्ऺदेश राज्य एवं अन्य 2015 (9) ए०सी०सी० 9०० में स्प्ि रूप से अवधािरत िकया गया है िक आरोप के स्तर पर न्यायालय को ्ऺथमदृष््िा इस तथ्य का िनधार्रण करना होता है िक अिभयु्वगण के िवरू्ध आरोप बनता है, या नहीं एवं इस तथ्य का िनधार्रण नहीं करना होता है िक प्ऴावली पर मौजूद साष्य से अिभयु्वगण के िवरु्ध युि्व-यु्व संदेह से परे मामला सािबत होता है या नहीं। माननीय उच्च न्यायालय ्षारा बृजमोहन बनाम उ्तर ्ऺदेश राज्य ्ऺाथर्ना -प्ऴ अन्तगर्त धारा 482-दं०्ऺ०सं० (12771 of 2023) में पािरत आदेश िदनांकित 11.01.2024 में यह ्ऺितपािदत िकया गया है िक There is no doubt that an offence under section 506 IPC, If committed in the state of UP is a cognizable offence. चू ंिक इस स्तर पर िकसी भी प्षकार ्षारा न्यायालय के सम्ष कोई साष्य ्ऺस्तुत नहीं िकये गये हैं, मा्ऴ िववेचना के आधार पर ्ऺस्तुत आरोप प्ऴ पर न्यायालय ्षारा ्ऺसं्ञान िलया जा चुका है। ्ऺाथर् / अिभयु्व की ओर से अपने ्ऺाथर्ना प्ऴ में इस बात से इन्कार नहीं िकया गया है िक यह सम्बिन्धत प्टेदारों का वकील नहीं था तथा उ्व फजर् आदेश के सम्बन्ध में भी कहा गया है िक वह आदेश फजर् नहीं बिल्क नकली की ्शेणी में आता है। सी०बी०आई० की ओर से दािखल आरोप प्ऴ के अवलोकन से ्ञात होता है िक न्यायालय से सम्बिन्धत सभी आदेश व कागजात ्ऺाथर् ्षारा माता ्ऺसाद को िदये जाते थे तथा माता ्ऺसाद ्षारा सभी कागजात ्ऺयोग हेतु परशुराम को िदया जाता था। वह उसे सम्बिन्धत अिधकािरयों के सम्ष ्ऺस्तुत करता था। जैसा िक प्टेदार परशुराम ्षारा अपने िदये गये बयान अंतगर्त धारा 161 दं०्ऺ०सं० में कहा गया है िक "तथाकिथत फजर्/जाली आदेश िदनांक 03.02.2011 को मुझे ्ऺाथर्/अिभयु्व ने िदया, उसके ्षारा अपने बयान में कहा गया है िक प्टेदार माता ्ऺसाद को जो भी कागज ्ऺाथर् / अिभयु्व देता था वह कागज माता ्ऺसाद ्षारा मुझे िदया जाता था और मेरे ्षारा उन कागजों को अिधकारी के सम्ष ्ऺस्तुत िकया जाता था।" अतः उपरो्व िव्शेषणानुसार िववेचक ्षारा संकिलत साष्य से अिभयु्व के िवरु्ध आरोप िवरचन के िलए ्ऺथम दृष््िा पयार्प्त साष्य प्ऴावली में दािखल आरोप प्ऴ से दिशत होते हैं तथा अिभयु्व ्षारा ्ऺस्तुत उन्मोचन ्ऺाथर्ना प्ऴ को इस स्तर पर स्वीकार िकए जाने के आधार पयार्प्त नहीं हैं। आदेश ्ऺाथर्/अिभयु्व दयाशंकर यादव ्षारा ्ऺस्तुत उन्मोचन ्ऺाथर्नाप्ऴ को िनरस्त िकया जाता है। प्ऴावली वास्ते आरोप िवरचन िदनांक 16.07.2024 को पेश हो। अिभयु्व िनयत ितिथ को ्िि्वगत रूप से उपिस्थत रहेंगे।"

7. The order dated 10.07.2024 was challenged by means of Criminal Revision No. 489/2024 (Daya Shankar Yadav vs. State/C.B.I.). The Revisional Court dismissed the same vide impugned order dated 31.01.2025 affirming the order of Magistrate dated 10.07.2024. The relevant portion of the order dated 31.01.2025 reads as under:- "न्यायालय ्षारा िनगरानीकतार् / अिभयु्व के िव्षान अिधव्वा व िवप्षी की ओर से उपिस्थत लोक अिभयोजक राज्य / सी०बी०आई की बहस सुनी तथा मूल प्ऴावली का अवलोकन िकया। िनगरानीकतार्/अिभयु्व की ओर यह तकर् िदया गया है िक िवचारण न्यायालय ्षारा पािरत 5 A482 No. 2090 of 2025 आलोच्य आदेश अिविधक होने के कारण खंिडत िकये जाने योग्य है जबिक इसके िवपरीपत लोक अिभयोजक राज्य / सी०बी०आई० की ओर यह तकर् िदया गया है िक िवचारण न्यायालय का ्ऺश्नगत आदेश िबल्कु ल सही है और उसमे िकसी ्ऺकार की कोई िविधक ्ऴुिट नहीं की गयी है। दण्ड ्ऺि्वया संिहता की धारा 397/399 (438/440 भारतीय नागिरक सुर्षा संिहता-2023) के अधीन ्ऺस्तुत दािण्डक िनगरानी में िनणर्य पािरत करते समय िनम्न तथ्यों पर िवचार िकया जाना समीचीन होता है:- 1- Correctness 2- Legality 3- Propiety of any finding 4- Regularity of any proceedings दण्ड ्ऺि्वया संिहता की धारा-397(2) (धारा-438(2) भारतीय नागिरक सुर्षा संिहता -2023) में ्ऺािवधािनत िकया गया है िक उपधारा (1) ्षारा ्ऺद्त पुनरी्षण की शि्वयों का ्ऺयोग िकसी अपील, जाँच, मुकदमें या अन्य कायर्वाही में पािरत िकसी भी अंतिरम आदेश के सम्बन्ध में नहीं िकया जायेगा। धारा-239 दण्ड ्ऺि्वया संिहता (धारा-262 भारतीय नागिरक सुर्षा संिहता-2023) में यह ्ऺािवधान िकया गया है िक यिद धारा-173 के अधीन पुिलस िरपोटर् और उसके साथ भेजे गये दस्तावेजों पर िवचार कर लेने पर और अिभयु्व की ऐसी परी्षा जैसी मिजस््िेट आवश्यक समझे, कर लेने पर और अिभयोजन तथा अिभयु्व को सुनवाई का अवसर देने के प्ाात मिजस््िेट अिभयु्व के िवरु्ध आरोप को िनराधार समझता है तो वह उसे उन्मोिचत कर देगा और ऐसा करने का कारण लेखब्ध करेगा। प्ऴावली के अवलोकन से िविदत होता है िक ्ऺस्तुत मामला आर०सी०-7 (एस)/2012 सी०बी०आई०/ए०सी०बी०, लखनऊ में माननीय उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ, लखनऊ ्षारा िरट यािचका संख्या-92 (सीिलग) 2009 में पािरत िदनांक-23.08.2012 के आदेश के अनुपालन में पंजीकृ त िकया गया था, िजसमें सी०बी०आई० को माननीय उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ, लखनऊ ्षारा िदनाक-03.02.2011 को जारी जाली और मनगढन्त आदेश तैयार करने और दािखल करने के मामले की जाँच करने का िनदरॏश िदया गया था। अिभयु्व/ िनगरानीकतार् एक भूिम िववाद के मामले में ्शी माता ्ऺसाद, ्शी परशुराम तथा अन्य प्टेदारों की ओर से एक अिधव्वा थे। ्शी माता ्ऺसाद ्षारा थाना िदवस ्ऺभारी के सरगंज को एक हस्तिलिखत प्ऴ िदनािकत-19.11.2011 ्ऺेिषत िकया गया था, िजसके साथ माननीय न्यायमूित ्शी ए०एन० वमार् के फजर् व एवं कू टरिचत आदेश िदनांिकत-03.02.2011 की ्ऺित भी सलग्न थी, िजसके ्षारा यह दावा िकया गया था िक प्टेदारों ्षारा कािबज भूिम के स्थानान्तरण पर स्टे लगा है। उपरो्व प्ऴ ्शी परशुराम (प्टेदार) के हस्तलेख में अन्य प्टेदारों की ओर से था, िजसमें उनके हस्ता्षर तथा आठ प्टेदारों के अंगूठा िनशान भी थे, जो िक नायब तहसीलदार ्षारा जारी नोिटस से ्ऺभािवत हो रहे थे। िववेचना में यह तथ्य ्ऺकाश में आये िक माननीय न्यायमूित ्शी ए०एन० वमार् िदनाक-06.04.2009 को सेवािनवृ्त हो गये थे, जबिक उपरो्व फजर् व कू टरिचत आदेश िदनांक-03.02.2011 का है, जब वह बेंच में नहीं थे। इस ्ऺकार माननीय उच्च न्यायालय ्षारा ऐसा कोई आदेश पािरत नहीं िकया गया था। यह तथ्य ्ऺकाश में आया है िक प्टेदारों ्षारा अिभयु्व/िनगरानीकतार् को वषर्-2009 से वषर्-2011 के दौरान अपने के स की पैरवी करने हेतु रूपये करीब 50 से 55 हजार भी िदये गये थे। सभी आदेश, यािचकायें तथा अन्य नोिटस आिद ्शी माता ्ऺसाद ्षारा अिभयु्व/िनगरानीकतार् से ्ऺाप्त िकये गये थे और उसके उपरान्त ्शी परशुराम को सौपे गये थे। ्शी माता ्ऺसाद ्षारा 6 A482 No. 2090 of 2025 िववेचना के दौरान यह तथ्य स्प्ि रूप से किथत िकये गये िक उपरो्व कू टरिचत आदेश उसके ्षारा अिभयु्व/िनगरानीकतार् से ्ऺाप्त िकया गया था और उसने बाद में ्शी परशुराम को दे िदया। यह तथ्य ्शी माता ्ऺसाद के मनोवै्ञािनक िव्शेषण परी्षण के दौरान भी सत्य पाये गये। ्शी परशुराम ्षारा भी इस तथ्य की पुि्ि की गयी िक उपरो्व कू टरिचत आदेश की ्ऺित उसे माता ्ऺसाद ने नवम्बर 2011 में दी थी, िजसे उसने उ्व प्ऴ िदनांिकत-19.11.2011 के साथ नायब तहसीलदार के सरगंज के कायार्लय में ्ऺस्तुत िकया था। जब परशुराम ने अिभयु्व/ िनगरानीकतार् से इस तथ्य का िवरोध करते हुये पूछा िक अिभयु्व / िनगरानीकतार् ्षारा उपरो्व कू टरिचत आदेश क्यों उपलब्ध कराया गया, तो अिभयु्व/िनगरानीकतार् ने उससे कहा था िक परेशान होने की आवश्यकता नहीं है और उन लोगों को कु छ भी नही होगा। उसने यह भी कहा था िक सभी प्टेदार यह बात कही भी स्वीकार न करे उन्होंने उ्व फजर् आदेश पेश िकया था। परशुराम ्षारा किथत उपरो्व तथ्य भी उनके मनोवै्ञािनक िव्शेषण परी्षण के दौरान सत्य पाये गये। जाँच पूरी होने पर, सी०बी०आई० ने आरोपी अिधव्वा दयाशंकर यादव के िवरू्ध धारा 465, 468, 471 और 420 भा०द०स० के साथ धारा-511 भा०द०सं० के तहत आरोप प्ऴ िदनांक-31.12.2012 को दािखल िकया। िव्षान िवचारण न्यायालय ्षारा िदनांक 01.01.2013 के आदेश के तहत अपराधों का सं्ञान िलया और आरोप प्ऴ में उिल्लिखत धारा -466 और 467 भा०द०सं० को जोडकर और धारा-511 भा०द०सं० को हटाकर धारा-465 466, 467, 468, 471 और 420 भा०द० सं० के तहत सम्मन जारी िकया। अिभयु्व/ िनगरानीकतार् ्षारा उ्व आदेश िदनांिकत-01.01.2013 को धारा-482 दण्ड ्ऺि्वया संिहता के अंतगर्त माननीय उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी। माननीय उच्च न्यायालय ने आदेश िदनांिकत 01.04.2019 पािरत करते हुये पाया िक िव्षान िवचारण न्यायालय ्षारा जारी िकया गया सम्मिनग आदेश िदनांिकत-01.01.2013 अविधपूणर् है, क्योिक िव्षान िवचारण न्यायालय ्षारा उन धाराओं में सम्मन जारी िकया गया था, जो िक आरोप प्ऴ का भाग नहीं था और उ्व सम्मिनग आदेश को अपास्त करते हुये िव्षान िवचारण न्यायालय को िविध के अनुसार नवीन सम्मिनग आदेश जारी करने का िनदरॏश िदया गया, साथ ही िवचारण को शी्सता से एक वषर् के भीतर िनस्तािरत करने का िनदरॏश भी िदया गया। माननीय उच्च न्यायालय के उपरो्व आदेश के अनुपालन में िव्षान िवचारण न्यायालय ्षारा िदनांक-15.04.2019 को धारा-465, 468, 471 तथा धारा-420 सपिठत धारा-511 भा०द०सं० में अिभयु्व/िनगरानीकतार् की उपिस्थित सुिनि्ात करने हेतु सम्मन आदेश जारी िकया गया परन्तु अिभयु्व/िनगरानीकतार् िव्षान िवचारण न्यायालय के सम्ष उपिस्थत नहीं हुआ, िजसके उपरान्त िव्षान िवचारण न्यायालय िदनाक-29.04.2019 को अिभयु्व/ िनगरानीकतार् के िवरू्ध गैर जमानतीय वारन्ट जारी िकया गया। उपरो्व सम्मन आदेश िदनांिकत 15.04.2019 को िनगरानीकतार् ्षारा धारा-482 दण्ड ्ऺि्वया संिहता के अंतगर्त माननीय उच्च न्यायालय के सम्ष ्ऺाथर्नाप्ऴ ्ऺस्तुत करते हुये पुनः इस आधार पर चुनौती दी गयी िक सी०बी०आई० ्षारा अपने ्षे्ऴािधकार से बाहर जाते हुये रेगुलर के स दजर् िकया गया, जबिक माननीय उच्च न्यायालय ्षारा मामले की जाँच िकये जाने का आदेश िदया गया था। माननीय उच्च न्यायालय ्षारा अपने आदेश िदनािकत-16.05.2019 ्षारा यह आदेश िदया गया है िक अिभयु्व / िनगरानीकतार् के िवरू्ध कोई भी िववशकारी आदेश न िकया जाये और इस कारण से िव्षान िवचारण न्यायालय की कायर्वाही स्थिगत रही। िव्षान िवचारण न्यायालय िदनांक 12.10.2021 को आदेश पािरत करते हुये माननीय उच्चतम न्यायालय ्षारा Asian Resurfacing of Road Agency Private Limited and Another Vs. Central Bureau of Investigation reported in (2018) 16 SCC 299 के वाद मे िदये गये िदशा िनदरॏशों के अनुपालन में उपरो्व स्थगन आदेश को िर्व कर िदया गया। अिभयु्व / िनगरानीकतार् ्षारा उ्व िर्वी आदेश िदनािकत-12.10.2021 को चुनौती दी गयी। अिभयु्व/िनगरानीकतार् ्षारा माननीय सेशन न्यायालय में अि्षम जमानत ्ऺाथर्ना ्ऺस्तुत िकया गया, िजसे न्यायालय ्षारा अस्वीकार कर िदया गया था, पुनः अिभयु्व / िनगरानीकतार् ्षारा माननीय उच्च न्यायालय में धारा-438 दण्ड ्ऺि्वया संिहता के अंतगर्त अि्षम जमानत हेतु ्ऺाथर्ना िदया गया, िजसे माननीय उच्च न्यायालय ्षारा िदनांक -07.08.2023 7 A482 No. 2090 of 2025 को स्वीकार िकये जाने का आदेश पािरत िकया गया। प्ऴावली के अवलोकन से यह भी िविदत होता है िक िव्षान िवचारण न्यायालय ्षारा अिभयु्व/ िनगरानीकतार् के उन्मोचन ्ऺाथर्नाप्ऴ को प्ऴावली में उपलब्ध साष्यों का पिरशीलन करते हुये अपने मिस्तष्क का ्ऺयोग कर पयार्प्त साष्य पाये जाने के उपरान्त ही िविध की दृि्ि से िव्षान िवचारण न्यायालय ्षारा समुिचत आदेश िदनािकत-10.07.2024 पािरत करते हुये अिभयु्व / िनगरानीकतार् का उन्मोचन ्ऺाथर्नाप्ऴ अस्वीकार िकया गया है, िजसमें कोई भी अवैधािनकता नहीं है। अिभयोजन प्ष/सी०बी०आई० ्षारा अिभयु्व/िनगरानीकतार् के िवरु्ध आरोप प्ऴ, िववेचना के दौरान ्ऺकाश में आये साष्यों के आधार पर ही ्ऺस्तुत िकया गया है, न िक संभावनाओं के आधार पर। प्ऴावली के अवलोकन से यह भी िविदत होता है िक ्ऺस्तुत मामला वषर् 2013 से िवचाराधीन है। अिभयु्व / िनगरानीकतार् ्षारा मामले को िवलिम्बत करने के आशय से िव्षान िवचारण न्यायालय एवं माननीय उच्च न्यायालयों में िभन्न-िभन्न ्ऺाथर्नाप्ऴ ्ऺस्तुत िकये जाने के कारण िपछले लगभग 11 वषॏल से कोई भी न्याियक कायर्वाही आगे नहीं बढ़ सकी है। ्ऺस्तुत आपरािधक िनगरानी को अिभयु्व/िनगरानीकतार् ्षारा जानबूझकर िव्षान िवचारण न्यायालय की न्याियक ्ऺि्वया को बािधत एवं िवलिम्बत करने के िलये ्ऺस्तुत िकया गया है। प्ऴावली के अवलोकन से यह भी िविदत होता है िक प्ऴावली पर आरोप प्ऴ ्ऺस्तुत करने के उपरान्त उभयप्षों के िव्षान अिधव्वा ्षारा कोई भी मौिखक व दस्तावेजी साष्य ्ऺस्तुत नहीं िकया गया है। ्ऺस्तुत ्ऺकरण में उपलब्ध दस्तावेजी साष्य का मूल्यांकन करने पर यह पाया जाता है िक उपरो्व वाद में िनगरानीकतार्/अिभयु्व पर आरोप िवरिचत िकये जाने हेतु ्ऺथम दृ्िया पयार्प्त साष्य प्ऴावली पर िव्धमान है। िनगरानीकतार्/अिभयु्व दोषी है या िनदरॏष है इस तथ्य का िनधार्रण प्ऴावली पर सम्पूणर् साष्य आने के बाद िकया जायेगा। माननीय सवरॏच्च न्यायालय ने राजवीर िसह बनाम उ०्ऺ० राज्य 2006(55) एसीसी 318, पलवेन््श बनाम बलवेन््श 2009 (65) एसीसी 399 शोराज िसह अहलावत बनाम उ०्ऺ० राज्य एआईआर 2013 सुको 52 एवं राज्य बनाम ए. अरुण कु मार 2015 (88) एसीसी 301 सुको में अवधािरत िकया गया है िक आरोप िवरिचत करने के िलये ्ऺबल संदेह भी पयार्प्त है िजसके आधार पर आरोप गिठत करने के िलये तत्वों के सम्बन्ध में न्यायालय ्षारा उपधारणात्मक राय बनाई जा सकती है। ओमवती बनाम राज्य 2001 सुकोके (ि्व०) 685 में अवधािरत िकया गया है िक जहां अिभयु्व के िवरु्ध आरोप िवरिचत िकया जाता है वहां न्यायालय के िलये कारण अिभिलिखत करना आवश्यक नहीं है। न्यायालय के िलये कारण अिभिलिखत करना वहां जरूरी होता है जहां पर न्यायालय ्षारा अिभयु्व को उन्मोिचत िकया जाता है। उड़ीसा राज्य बनाम देवेन््श नाथ पाधी 2005 (51) एसीसी 209 सुको में तीन न्यायमूितगण की न्यायपीठ ने यह अवधािरत िकया है िक आरोप िवरिचत करने के ्ऺकम पर अिभयु्व ्षारा ्ऺस्तुत साम्षी / अिभलेख पर िवचार नहीं िकया जा सकता क्योंिक आरोप िवरिचत करने के ्ऺ्वम पर गुण दोष का परी्षण करने वाली िवस्तृत जांच अपेि्षत नहीं होती। तिमलनाडू राज्य बनाम एन सुरेशराजन 2014 (84) एसीसी 656 सुको के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ्षारा यह अवधािरत िकया गया है िक दण्ड ्ऺि्वया संिहता की धारा-227 के अधीन उन्मोचन आवेदन पर िवचार करते समय न्यायालय को यह मान कर चलना होगा िक अिभयोजन ्षारा अिभलेख पर लाई गई साम्षी सही है। पी० िवजयन बनाम के रल राज्य (2010) 2 सुकोके 398 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अवधािरत िकया है िक धारा-227 दं०्ऺ०सं० के अधीन उन्मोचन के ्ऺश्न पर िवचार करते समय यिद न्यायालय का यह िनष्कषर् िनकलता है िक अिभयु्व के िवरू्ध िवचारण हेतु अ्षसिरत होने 8 A482 No. 2090 of 2025 का पयार्प्त आधार है तो आरोप िवरिचत िकया जायेगा। इस ्ऺकम पर साष्य एवं सम्भा्िताओं का गहन मूल्यांकन नहीं िकया जायेगा। उन्मोचन आवेदन पर िवचार करते समय न्यायालय को यह िवचार करना नहीं होता िक िवचारण का अंत दोषिसि्ध में होगा अथवा दोषमुि्व में। माननीय उच्चतम न्यायालय ्षारा सज्जन कु मार बनाम सी०बी०आई० 2010 (9) एस०सी०सी० पृ्ष 368 के मामले में यह िस्धांत ्ऺितपािदत िकया गया है िक आरोप िवरिचत करते समय िवचारण न्यायालय अिभयोजन प्ष ्षारा ्ऺस्तुत िकए गए साष्यो के आधार पर यह िनष्कषर् देंगा िक क्या अपराध में संिलप्तता के गंभीर सन्देंह िव्यमान है। यिद उ्व तथ्य ्ऺमािणत है तभी आरोप िवरिचत िकया जायेंगा। मा्ऴ सन्देह के आधार पर आरोप िवरिचत नहीं िकया जायेगा। माननीय न्यायालय के उ्व दृ्िांत के पिर्ऺेष्य में ्ऺश्नगत ्ऺकरण का मूल्यांकन करने पर यह पाया जाता है िक बृहद संभावनाओ तथा गंभीर अपराध में संिलप्तता के सुसंगत साष्य अन्तगर्त धारा 173 दण्ड ्ऺिकया संिहता ्ऺस्तुत िकया गया है। माननीय न्यायालयों की उपरो्व िविध ्िवस्थाओं में ्ऺितपािदत िविधक िस्धान्तों व दण्ड ्ऺि्वया संिहता की धारा-397/399 (438/440 भारतीय नागिरक सुर्षा संिहता-2023) के ्ऺावधानों को म्देनजर रखते हुये तथा मामले के तथ्य एवं पिरिस्थितयों को दृि्िगत रखते हुये िनगरानीकतार् / अिभयु्व की ओर से ्ऺस्तुत िनगरानी में इस स्तर पर कोई भी िविधक बल नहीं है, तथा िव्षान िवशेष न्याियक मिजस््िेट ्ऺदूषण/सी०बी०आई० लखनऊ ्षारा पािरत आलोच्य आदेश िदनांक 10.07.2024 में कोई अशु्धता, अवैधता या अिनयिमतता नहीं पाई जाती है। आलोच्य आदेश िदनांिकत-10.07.2024 में िकसी ्ऺकार के हस्त्षेप की आवश्यकता नहीं है। अतः इस न्यायालय की राय में ्ऺस्तुत दािण्डक िनगरानी िनरस्त िकये जाने योग्य है। आदेश ्ऺस्तुत दािण्डक िनगरानी संख्या-489/2024 िनरस्त की जाती है। िव्षान िवशेष न्याियक मिजस््िेट ्ऺदूषण/सी०बी०आई० लखनऊ ्षारा पािरत आलोच्य आदेश िदनांक-10.07.2024 की पुि्ि की जाती है। िव्षान िवचारण न्यायालय को आदेिशत िकया जाता है िक के स न० -01/2013, आर०सी०न०-0532012S0007 को अितशी्स िविधनुसार िनस्तािरत िकया जाना सुिनि्ात करें। इस िनणर्य व आदेश की एक ्ऺित अनुपालनाथर् िव्षान िवचारण न्यायालय ्ऺेिषत हो तथा िव्षान िवचारण न्यायालय की प्ऴावली िनयमानुसार वापस की जाये, तथा िनगरानी प्ऴावली िनयमानुसार दािखल दफ्तर हो।"

8. Being aggrieved by the orders dated 10.07.2024 and 31.01.2025, the present application has been filed before this Court.

9. While pressing the present application for the main relief(s) sought, quoted above, the learned counsel for the applicant says that taking case of the prosecution/CBI on its face value as correct, though not correct, the applicant/an Advocate of this Court tenders unconditional apology and based upon the same prayers sought by the applicant/an Advocate including for quashing of the proceedings be allowed, as have been quashed by this Court in the case of an Advocate of this Court namely Phool Bux Singh.

10. In continuation, the learned counsel for the applicant says that Phool Bux Singh, Advocate was also charge-sheeted by the CBI and his discharge application was rejected by the Special Judicial Magistrate (C.B.I.) vide order dated 12.10.2015 and the said order was affirmed by Additional District Judge, Lucknow vide order dated 08.08.2018 passed 9 A482 No. 2090 of 2025 in Criminal Revision No. 472/2025 and thereafter Phool Bux Singh, Advocate approached this Court by means of filing an Application U/S 482 No. 5696 of 2018, which was allowed by this Court vide order dated 24.08.2022.

11. It is further stated that CBI opposed the prayer of Phool Bux Singh Advocate, through Sri Anurag Kumar Singh, learned Advocate appearing for CBI, who before this Court submitted that interpolation was committed in the record of this Court in judicial proceeding and thereafter the C.B.I. investigated the matter and filed the charge sheet as per the direction of this Court and this Court may pass appropriate orders in the facts and circumstances of the case and taking note of the entire aspects of the case the final order dated 24.08.2022, quashing the criminal proceedings pending against Phool Bux Singh, Advocate, was passed. The relevant paragraph of the final order dated 24.08.2022 reads as under:- "21. The facts are not disputed. There were interpolations in the certified copy of the order of this Court dated 13.10.2004 passed in Writ Petition No.5349 (S/S) of 1997. It is not in dispute that the Court is custodia legis of its proceeding and record. Interpolation was made in the order passed by this Court and, therefore, this Court is of the view that considering it is solitary case against the applicant herein and his conduct, as an Advocate, has been impeccable throughout, this Court, in exercising of inherent powers under Section 482 CrPC, is of the considered view that the application is liable to be allowed and the impugned proceedings and orders are liable to be quashed. "

12. He further submitted that the final order dated 24.08.2022 was impeached/assailed before the Hon'ble Apex Court in Special Leave to Appeal (Crl.) No(s). 2674-2675/2023 (State through Central Bureau of Investigation and Anr. vs. Phool Bux Singh and Anr.) and the Hon'ble Apex Court, upon due consideration of the facts of the said case, dismissed the said SLP vide order dated 27.11.2024, which reads as under:- "Upon hearing the counsel the court made the following ORDER

1. We are not inclined to interfere with the impugned judgment and order of the High Court; hence, the special leave petitions are dismissed.

2. Pending application(s), if any, shall stand disposed of."

13. He further submitted that in the instant case interpolation was not done in the Court's record and as such indulgence of this Court is required in the matter in the light of the order dated 24.08.2022 passed by this Court and also the order dated 27.11.2024 passed by the Hon'ble Apex Court. Prayer is to allow the instant application for the prayers sought including quashing of the entire criminal proceedings pending against the present applicant/an Advocate of this Court.

14. Sri Sri Anurag Kumar Singh, the learned counsel for the opposite 10 A482 No. 2090 of 2025 party/C.B.I. could not dispute the aforesaid.

15. Considered the aforesaid and also perused the record.

16. Upon due consideration of the aforesaid, this Court finds that interference the following fact(s)/reason(s):- is required. It the matter is for (i) The allegations against the applicant/an Advocate of this Court, is that he prepared the order of this Court dated 03.02.2011, a copy of which is annexed as Annexure No. 10 at page 151 to 152 of the paper book, alleged to be passed in Writ Petition No. Nill (M/S) of 2011. (ii) The criminal case is proceeding on the basis of photocopy of the order dated 03.02.2011, alleged to be prepared by the applicant/an Advocate of this Court. (iii) The original document i.e. original order dated 03.02.2011 has not been placed on record by C.B.I. (iv) The beneficiaries of the order dated 03.02.2011 have been exonerated by the C.B.I. (v) There is no evidence/material available with the C.B.I. connecting the applicant/an Advocate to the making of the fake document, as typewriter or computer related to preparation of document i.e. order dated 03.02.2011 in issue has not been recovered. In Sheila Sebastian vs. Jawaharaj and another, (2018) 7 SCC 581, the Hon'ble Apex Court has observed that the prosecution must establish that the accused made the fake document. This principle has also been taken note of by the Hon'ble Apex Court in the case of Jupally Lakshmikantha Reddy vs. State of Andhra Pradesh and another, 2025 SCC OnLine SC 1950. (vi) It is solitary case against the applicant herein and his conduct, as an Advocate, has been impeccable throughout and the applicant has also tendered unconditional apology.

17. For the foregoing reasons, this Court, in exercising of inherent powers under Section 482 CrPC, is of the considered view that the instant application is liable to be allowed and the impugned proceedings and orders dated 10.07.2024 and 31.01.2025 are liable to be quashed.

18. Ordered accordingly. December 10, 2025 Arun/- (Saurabh Lavania,J.) ARUN KUMAR GANGWAR High Court of Judicature at Allahabad, Lucknow Bench

2. Heard Sri Avinash Kumar Srivastava, the learned counsel for the applicant and Sri Anurag Kumar Singh, the learned counsel for the opposite party/C.B.I. as well as perused the record.

3. The instant application has been filed challenging the order dated 10.07.2024 passed by the Special Judicial Magistrate Pollution/C.B.I., Lucknow (in short "Magistrate") in Case No. 01/2013 (C.B.I. vs. Daya Shankar Yadav), R.C. No.0532012S0007, under Section(s)- 465, 468, 471 and 420 read with 511 IPC, whereby the Magistrate rejected the application preferred by the applicant seeking discharge and also the order dated 31.01.2025 passed by the Special Judge (Prevention of Corruption Act)/C./B.I., Court No. 3, Lucknow (in short the "Revisional Court") in Criminal Revision No. 489/2024 (Daya Shankar Yadav vs. State/C.B.I.) instituted in terms of Section- 438/440 B.N.S.S., 2023, akin to Section 397/399 Cr.P.C. (now repealed), whereby the Revisional Court dismissed the said revision filed by the applicant challenging the order dated 10.07.2024 passed by the Magistrate and affirmed the said order.

4. The main relief(s) sought in the instant application are extracted hereunder:- "Wherefore, it is most humbly prayed that this Hon'ble Court may be pleased to set-aside the impugned order dated 31.01.2025, passed by Learned Special Judge (Prevention of Corruption Act)/C.B.I., Court No. 3, Lucknow in Criminal Revision No. 489 of 2024, Daya Shankar Yadav Vs. C.B.I., as well as impugned order dated 10.07.2024, passed by Learned Special Judicial Magistrate Pollution/C.B.I., Lucknow, as contained in Annexure No. 1 and 2 to this application, in the interest of justice. It is further prayed that this Hon'ble Court may also be pleased to allow 2 A482 No. 2090 of 2025 the discharge application, quashing the proceedings of Case No. 01 of 2013 (R.C. No. 053201250007/2012) С.В.I. Vs. Daya Shankar Yadav, pending the court of Learned Special Judicial Magistrate Pollution/C.B.I., Lucknow, U/s. 465, 468, 471, 420 r/w 511 I.P.C., Police Station-CBI/ SCB, Lucknow, in the interest of justice."

5. Brief facts of the case are as under:- (i) On a complaint received from the Registrar of this Court vide Letter No. 6195 dated 27.08.2012 enclosing therewith a certified copy of the order dated 23.08.2012 passed by this Court in Writ Petition No. 9 (Ceiling) of 2012 (Suraj Lal and others vs. State of UP and others), whereby this Court directed the C.B.I. to investigate the matter as to who are the persons involved in preparation and filing of forged and fabricated order dated 03.02.2011, which has been brought on record by the contesting respondent by filing counter affidavit before Tehsildar, Kaiserganj, District- Bahraich, an FIR/Case Crime No. 0532012S0007 was registered at Police Station- CBI/SCB, District- Lucknow on 06.09.2012. (ii) The opposite party/C.B.I. thereafter carried out the investigation and submitted the charge sheet against the applicant before the competent court of jurisdiction namely Special Judicial Magistrate (Pollution)/C.B.I., Lucknow. (iii) Alongwith the charge sheet, the C.B.I. filed the photocopy of the alleged order dated 03.02.2011, a copy of which is annexed as Annexure No. 10 at page 151 to 152 of the paper book, passed in Writ Petition No. Nill (M/S) of 2011 filed by Mata Prasad s/o Ram Harakh, Budh Ram s/o Sattan, Sita Ram s/o Sattan, Suraj Lal s/o Ram Jiyawan, Sukl Lal s/o Daya Ram, Kusum w/o Ram Autar and Ram Pratap s/o Hridya impleading therein four official respondents and one private opposite party namely Shri Hari Saran Singh. (iv) It is to be noted that the copy of the order dated 03.02.201, on record, only bears the seal of Oath Commissioner. In other words, this order does not bear the seal of this Court. (v) It is also to be noted that the FIR/RC No. 0532012S0007 was lodged against unknown persons. (vi) From the record and also the submissions advanced by the parties' counsel before this Court, it appears that the statement(s) of the beneficiaries, named above, who filed the affidavit(s) before C.B.I. were recorded by the C.B.I. and based upon their statement(s), which includes Forensic Science Examination according to which the copy of the order dated 03.02.2011 was provided by the applicant, treating it to be a gospel truth, exonerated the beneficiaries of the order dated 03.02.2011 and filed the charge sheet only against the present applicant based upon the photocopy of order, which does not bear the seal of this Court. (vii) The record also indicates that C.B.I. while filing the charge-sheet did not verify as to whether the order was typed from the computer or typewriter belonging to the present applicant, which according to learned 3 A482 No. 2090 of 2025 counsel for the applicant, is required to connect the applicant with the crime indicated in the FIR.

6. In the aforesaid factual background of the case, the application seeking discharge was filed before the Magistrate, which was rejected vide impugned order dated 10.07.2024. The relevant portion of order dated 10.07.2024 is extracted hereinunder:- "प्ऴावली के अवलोकन से यह िविदत होता है िक ्ऺस्तुत वाद RC 7(S)/2012 माननीय उच्च न्यायालय, खण्डपीठ लखनऊ, लखनऊ, में W.P. 92 (Ceiling)/'2009 में पािरत आदेश िदनांिकत 23.08.2012 के अनु्वम में सी०बी०आई० ्षारा अिभयु्व दयाशंकर यादव के िवरु्ध अपराध सं०-01/2013, 465,468,471 एवं 420 r/w-511 भा०द०सं० के अंतगर्त ्ऺथम सूचना िरपोटर् पंजीकृ त कर, अन्वेषण की कायर्वाही संपािदत की गयी। अन्वेषण के दौरान साष्य संकलन के उपरान्त िववेचक ्षारा ्ऺकरण में अिभयु्व के िवरु्ध धारा- 465,468,471 एवं 420 r/w-511 भा०दं०सं० के अंतगर्त आरोप प्ऴ ्ऺेिषत िकया गया, िजस पर न्यायालय ्षारा अपने आदेश के माध्यम से ्ऺकरण का ्ऺसं्ञान िलया गया। परशुराम ने िदनांक 19.11.2011 को थाना िदवस पर एक हस्तिलिखत प्ऴ ्ऺस्तुत िकया। माननीय न्यायमूित ए.एन.वमार् के िदनांक 03.02.2011 के जाली और मनगढ़ंत आदेश की ्ऺित के साथ ्ऺस्तुत िकया गया है, िजसमें दावा िकया गया है िक िजस भूिम पर प्टेदार कािबज थे, उसके हस्तांतरण पर रोक है। उ्व प्ऴ िदनांिकत 19.11.2011 ्शी परशु राम पु्ऴ ितलक ( प्टेदार) ्षारा प्टेदारों की ओर से िलखा गया था और इसमें उनके हस्ता्षर के अलावा 08 प्टेदारों अथार्त् ्शी के दार, पारसरम पु्ऴ ्ऺभु, माता ्ऺसाद, अवधेश, ननकू , बच्चा लाल, सूयर् लाल और ्शीमती दयावती के अंगूठे के िनशान हैं, जो नायब तहसीलदार ्षारा जारी नोिटस से ्ऺभािवत थे। ्ऺाथर् / अिभयु्व पर माननीय उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ, लखनऊ का जाली और मनगढंत आदेश तैयार करने और दािखल करने का आरोप है। वस्तुतः अिभयु्व की दोिषता या अन्यथा के बारे में िनष्कषर् अिभिलिखत करने के पूवर् परी्षण और िनणर्य का जो मानक लागू िकया जाना होता है, उसे आरोप िवरचन अथवा उन्मोचन के दौरान िविना्य करने के ्ऺ्वम पर ठीक-ठाक लागू नहीं िकया जाता है। अिपतु इस ्ऺ्वम पर न्यायालय को मुख्यतः यह देखना होता है िक ्ऺथम दृ्िया मामला बनता है अथवा नहीं। इस स्तर पर न्यायालय का ्ऺयोजन इस बात से आ्षस्त होना है िक न्यायालय का समाधान हो जाए िक अिभयोग तुच्छ नहीं है और अिभयु्व के िवरु्ध कायर्वाही िकए जाने के िलए कु छ र््व िववेचन एवं साम्षी मौजूद है। ्ऺश्नगत ्ऺकरण के तथ्यों एवं पिरिस्थितयों में एवं उपयु िव्शेषण के आधार पर यह ्ऺमािणत नहीं होता है िक ्ऺश्नगत ्ऺकरण में ्ऺाथर्/अिभयु्व के िवरु्ध कायर्वाही करने का पयार्त आधार नहीं है। ऐसी िस्थित में ्ऺश्गत ्ऺकरण के तथ्यों एवं पिरिस्थितयों में ्ऺाथर् / अिभयु्व को इस स्तर पर उन्मोिचत िकया जाना न्यायोिचत नहीं होगा। जहां तक ्ऺाथर्ना प्ऴ में उिल्लिखत अन्य िबन्दुओं के सापे्ष ्ऺस्तुत िव्षान अिधव्वा का तकर् है , तो उ्व तथ्य इस स्तर पर िनष्किषत नहीं हो सकते हैं, अिपतु अिभयोजन साष्य के उपरान्त ही देखा जा सकता है। यह स्प्ि है िक वतर्मान में उभयप्षों के साष्य अभी अंिकत नहीं हुए हैं, अिभयु्व के िवरु्ध आरोप भी अभी िवरिचत नहीं हुए हैं। यह सुस्थािपत िस्धान्त है िक इस स्तर पर संि्षत िवचारण नहीं िकया जाना है और यह देखा जाना है िक क्या ्ऺथम दृ्िया साष्य साशय इस ्ऺकार का है, जो आरोप बनाए जाने के िलए पयार्प्त है। इस मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय के ्षारा यह सुस्थािपत रूप से अवधािरत िकये गया है िक आरोप बनाने के िलए साष्य इस ्ऺकार के हों िक आरोप बनाया जा सके । सज्जन कु मार बनाम सी.बी.आई. 2010 (9) एस.सी.सी. 368 के ्ऺकरण में भी माननीय उच्चतम न्यायालय ्षारा उपरो्व सन्दभर् में यह अिभमत िदया गया है िक "आरोप िवरिचत िकये जाते समय या उन्मोचन के समय न्यायालय को समस्त तथ्यों एवं साष्यों का िव्शेषण नहीं करना है, साष्य के मूल और 4 A482 No. 2090 of 2025 िव्षसनीयता का िनधार्रण िवचारण के समय िकया जायेगा।" िविध ्िवस्था कान्ती भ्शा शाह बनाम पि्ाम बंगाल राज्य ए.आई.आर 2000 एस.सी. 522 में माननीय उच्चतम न्यायालय ्षारा यह मतािभवाि्व करते हुए िनणर्त िकया गया है िक "आरोप िविचत िकये जाने के िलए ्ऺथम दृष््िा के स डायरी व अन्य ्ऺप्ऴों के आधार पर यिद अिभयु्वगण ्षारा अपराध कािरत िकये जाने की उपधारणा उत्पन्न होती है तो आरोप िवरिचत िकया जा सकता है, परन्तु उन्मोचन िकये जाने हेतु पयार्प्त कारण दिशत करना आवश्यक है।" माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद ्षारा अपने न्याय िनणर्यन उमेश िसह एवं अन्य बनाम उ्तर ्ऺदेश राज्य एवं अन्य 2015 (9) ए०सी०सी० 9०० में स्प्ि रूप से अवधािरत िकया गया है िक आरोप के स्तर पर न्यायालय को ्ऺथमदृष््िा इस तथ्य का िनधार्रण करना होता है िक अिभयु्वगण के िवरू्ध आरोप बनता है, या नहीं एवं इस तथ्य का िनधार्रण नहीं करना होता है िक प्ऴावली पर मौजूद साष्य से अिभयु्वगण के िवरु्ध युि्व-यु्व संदेह से परे मामला सािबत होता है या नहीं। माननीय उच्च न्यायालय ्षारा बृजमोहन बनाम उ्तर ्ऺदेश राज्य ्ऺाथर्ना -प्ऴ अन्तगर्त धारा 482-दं०्ऺ०सं० (12771 of 2023) में पािरत आदेश िदनांकित 11.01.2024 में यह ्ऺितपािदत िकया गया है िक There is no doubt that an offence under section 506 IPC, If committed in the state of UP is a cognizable offence. चू ंिक इस स्तर पर िकसी भी प्षकार ्षारा न्यायालय के सम्ष कोई साष्य ्ऺस्तुत नहीं िकये गये हैं, मा्ऴ िववेचना के आधार पर ्ऺस्तुत आरोप प्ऴ पर न्यायालय ्षारा ्ऺसं्ञान िलया जा चुका है। ्ऺाथर् / अिभयु्व की ओर से अपने ्ऺाथर्ना प्ऴ में इस बात से इन्कार नहीं िकया गया है िक यह सम्बिन्धत प्टेदारों का वकील नहीं था तथा उ्व फजर् आदेश के सम्बन्ध में भी कहा गया है िक वह आदेश फजर् नहीं बिल्क नकली की ्शेणी में आता है। सी०बी०आई० की ओर से दािखल आरोप प्ऴ के अवलोकन से ्ञात होता है िक न्यायालय से सम्बिन्धत सभी आदेश व कागजात ्ऺाथर् ्षारा माता ्ऺसाद को िदये जाते थे तथा माता ्ऺसाद ्षारा सभी कागजात ्ऺयोग हेतु परशुराम को िदया जाता था। वह उसे सम्बिन्धत अिधकािरयों के सम्ष ्ऺस्तुत करता था। जैसा िक प्टेदार परशुराम ्षारा अपने िदये गये बयान अंतगर्त धारा 161 दं०्ऺ०सं० में कहा गया है िक "तथाकिथत फजर्/जाली आदेश िदनांक 03.02.2011 को मुझे ्ऺाथर्/अिभयु्व ने िदया, उसके ्षारा अपने बयान में कहा गया है िक प्टेदार माता ्ऺसाद को जो भी कागज ्ऺाथर् / अिभयु्व देता था वह कागज माता ्ऺसाद ्षारा मुझे िदया जाता था और मेरे ्षारा उन कागजों को अिधकारी के सम्ष ्ऺस्तुत िकया जाता था।" अतः उपरो्व िव्शेषणानुसार िववेचक ्षारा संकिलत साष्य से अिभयु्व के िवरु्ध आरोप िवरचन के िलए ्ऺथम दृष््िा पयार्प्त साष्य प्ऴावली में दािखल आरोप प्ऴ से दिशत होते हैं तथा अिभयु्व ्षारा ्ऺस्तुत उन्मोचन ्ऺाथर्ना प्ऴ को इस स्तर पर स्वीकार िकए जाने के आधार पयार्प्त नहीं हैं। आदेश ्ऺाथर्/अिभयु्व दयाशंकर यादव ्षारा ्ऺस्तुत उन्मोचन ्ऺाथर्नाप्ऴ को िनरस्त िकया जाता है। प्ऴावली वास्ते आरोप िवरचन िदनांक 16.07.2024 को पेश हो। अिभयु्व िनयत ितिथ को ्िि्वगत रूप से उपिस्थत रहेंगे।"

7. The order dated 10.07.2024 was challenged by means of Criminal Revision No. 489/2024 (Daya Shankar Yadav vs. State/C.B.I.). The Revisional Court dismissed the same vide impugned order dated 31.01.2025 affirming the order of Magistrate dated 10.07.2024. The relevant portion of the order dated 31.01.2025 reads as under:- "न्यायालय ्षारा िनगरानीकतार् / अिभयु्व के िव्षान अिधव्वा व िवप्षी की ओर से उपिस्थत लोक अिभयोजक राज्य / सी०बी०आई की बहस सुनी तथा मूल प्ऴावली का अवलोकन िकया। िनगरानीकतार्/अिभयु्व की ओर यह तकर् िदया गया है िक िवचारण न्यायालय ्षारा पािरत 5 A482 No. 2090 of 2025 आलोच्य आदेश अिविधक होने के कारण खंिडत िकये जाने योग्य है जबिक इसके िवपरीपत लोक अिभयोजक राज्य / सी०बी०आई० की ओर यह तकर् िदया गया है िक िवचारण न्यायालय का ्ऺश्नगत आदेश िबल्कु ल सही है और उसमे िकसी ्ऺकार की कोई िविधक ्ऴुिट नहीं की गयी है। दण्ड ्ऺि्वया संिहता की धारा 397/399 (438/440 भारतीय नागिरक सुर्षा संिहता-2023) के अधीन ्ऺस्तुत दािण्डक िनगरानी में िनणर्य पािरत करते समय िनम्न तथ्यों पर िवचार िकया जाना समीचीन होता है:- 1- Correctness 2- Legality 3- Propiety of any finding 4- Regularity of any proceedings दण्ड ्ऺि्वया संिहता की धारा-397(2) (धारा-438(2) भारतीय नागिरक सुर्षा संिहता -2023) में ्ऺािवधािनत िकया गया है िक उपधारा (1) ्षारा ्ऺद्त पुनरी्षण की शि्वयों का ्ऺयोग िकसी अपील, जाँच, मुकदमें या अन्य कायर्वाही में पािरत िकसी भी अंतिरम आदेश के सम्बन्ध में नहीं िकया जायेगा। धारा-239 दण्ड ्ऺि्वया संिहता (धारा-262 भारतीय नागिरक सुर्षा संिहता-2023) में यह ्ऺािवधान िकया गया है िक यिद धारा-173 के अधीन पुिलस िरपोटर् और उसके साथ भेजे गये दस्तावेजों पर िवचार कर लेने पर और अिभयु्व की ऐसी परी्षा जैसी मिजस््िेट आवश्यक समझे, कर लेने पर और अिभयोजन तथा अिभयु्व को सुनवाई का अवसर देने के प्ाात मिजस््िेट अिभयु्व के िवरु्ध आरोप को िनराधार समझता है तो वह उसे उन्मोिचत कर देगा और ऐसा करने का कारण लेखब्ध करेगा। प्ऴावली के अवलोकन से िविदत होता है िक ्ऺस्तुत मामला आर०सी०-7 (एस)/2012 सी०बी०आई०/ए०सी०बी०, लखनऊ में माननीय उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ, लखनऊ ्षारा िरट यािचका संख्या-92 (सीिलग) 2009 में पािरत िदनांक-23.08.2012 के आदेश के अनुपालन में पंजीकृ त िकया गया था, िजसमें सी०बी०आई० को माननीय उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ, लखनऊ ्षारा िदनाक-03.02.2011 को जारी जाली और मनगढन्त आदेश तैयार करने और दािखल करने के मामले की जाँच करने का िनदरॏश िदया गया था। अिभयु्व/ िनगरानीकतार् एक भूिम िववाद के मामले में ्शी माता ्ऺसाद, ्शी परशुराम तथा अन्य प्टेदारों की ओर से एक अिधव्वा थे। ्शी माता ्ऺसाद ्षारा थाना िदवस ्ऺभारी के सरगंज को एक हस्तिलिखत प्ऴ िदनािकत-19.11.2011 ्ऺेिषत िकया गया था, िजसके साथ माननीय न्यायमूित ्शी ए०एन० वमार् के फजर् व एवं कू टरिचत आदेश िदनांिकत-03.02.2011 की ्ऺित भी सलग्न थी, िजसके ्षारा यह दावा िकया गया था िक प्टेदारों ्षारा कािबज भूिम के स्थानान्तरण पर स्टे लगा है। उपरो्व प्ऴ ्शी परशुराम (प्टेदार) के हस्तलेख में अन्य प्टेदारों की ओर से था, िजसमें उनके हस्ता्षर तथा आठ प्टेदारों के अंगूठा िनशान भी थे, जो िक नायब तहसीलदार ्षारा जारी नोिटस से ्ऺभािवत हो रहे थे। िववेचना में यह तथ्य ्ऺकाश में आये िक माननीय न्यायमूित ्शी ए०एन० वमार् िदनाक-06.04.2009 को सेवािनवृ्त हो गये थे, जबिक उपरो्व फजर् व कू टरिचत आदेश िदनांक-03.02.2011 का है, जब वह बेंच में नहीं थे। इस ्ऺकार माननीय उच्च न्यायालय ्षारा ऐसा कोई आदेश पािरत नहीं िकया गया था। यह तथ्य ्ऺकाश में आया है िक प्टेदारों ्षारा अिभयु्व/िनगरानीकतार् को वषर्-2009 से वषर्-2011 के दौरान अपने के स की पैरवी करने हेतु रूपये करीब 50 से 55 हजार भी िदये गये थे। सभी आदेश, यािचकायें तथा अन्य नोिटस आिद ्शी माता ्ऺसाद ्षारा अिभयु्व/िनगरानीकतार् से ्ऺाप्त िकये गये थे और उसके उपरान्त ्शी परशुराम को सौपे गये थे। ्शी माता ्ऺसाद ्षारा 6 A482 No. 2090 of 2025 िववेचना के दौरान यह तथ्य स्प्ि रूप से किथत िकये गये िक उपरो्व कू टरिचत आदेश उसके ्षारा अिभयु्व/िनगरानीकतार् से ्ऺाप्त िकया गया था और उसने बाद में ्शी परशुराम को दे िदया। यह तथ्य ्शी माता ्ऺसाद के मनोवै्ञािनक िव्शेषण परी्षण के दौरान भी सत्य पाये गये। ्शी परशुराम ्षारा भी इस तथ्य की पुि्ि की गयी िक उपरो्व कू टरिचत आदेश की ्ऺित उसे माता ्ऺसाद ने नवम्बर 2011 में दी थी, िजसे उसने उ्व प्ऴ िदनांिकत-19.11.2011 के साथ नायब तहसीलदार के सरगंज के कायार्लय में ्ऺस्तुत िकया था। जब परशुराम ने अिभयु्व/ िनगरानीकतार् से इस तथ्य का िवरोध करते हुये पूछा िक अिभयु्व / िनगरानीकतार् ्षारा उपरो्व कू टरिचत आदेश क्यों उपलब्ध कराया गया, तो अिभयु्व/िनगरानीकतार् ने उससे कहा था िक परेशान होने की आवश्यकता नहीं है और उन लोगों को कु छ भी नही होगा। उसने यह भी कहा था िक सभी प्टेदार यह बात कही भी स्वीकार न करे उन्होंने उ्व फजर् आदेश पेश िकया था। परशुराम ्षारा किथत उपरो्व तथ्य भी उनके मनोवै्ञािनक िव्शेषण परी्षण के दौरान सत्य पाये गये। जाँच पूरी होने पर, सी०बी०आई० ने आरोपी अिधव्वा दयाशंकर यादव के िवरू्ध धारा 465, 468, 471 और 420 भा०द०स० के साथ धारा-511 भा०द०सं० के तहत आरोप प्ऴ िदनांक-31.12.2012 को दािखल िकया। िव्षान िवचारण न्यायालय ्षारा िदनांक 01.01.2013 के आदेश के तहत अपराधों का सं्ञान िलया और आरोप प्ऴ में उिल्लिखत धारा -466 और 467 भा०द०सं० को जोडकर और धारा-511 भा०द०सं० को हटाकर धारा-465 466, 467, 468, 471 और 420 भा०द० सं० के तहत सम्मन जारी िकया। अिभयु्व/ िनगरानीकतार् ्षारा उ्व आदेश िदनांिकत-01.01.2013 को धारा-482 दण्ड ्ऺि्वया संिहता के अंतगर्त माननीय उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी। माननीय उच्च न्यायालय ने आदेश िदनांिकत 01.04.2019 पािरत करते हुये पाया िक िव्षान िवचारण न्यायालय ्षारा जारी िकया गया सम्मिनग आदेश िदनांिकत-01.01.2013 अविधपूणर् है, क्योिक िव्षान िवचारण न्यायालय ्षारा उन धाराओं में सम्मन जारी िकया गया था, जो िक आरोप प्ऴ का भाग नहीं था और उ्व सम्मिनग आदेश को अपास्त करते हुये िव्षान िवचारण न्यायालय को िविध के अनुसार नवीन सम्मिनग आदेश जारी करने का िनदरॏश िदया गया, साथ ही िवचारण को शी्सता से एक वषर् के भीतर िनस्तािरत करने का िनदरॏश भी िदया गया। माननीय उच्च न्यायालय के उपरो्व आदेश के अनुपालन में िव्षान िवचारण न्यायालय ्षारा िदनांक-15.04.2019 को धारा-465, 468, 471 तथा धारा-420 सपिठत धारा-511 भा०द०सं० में अिभयु्व/िनगरानीकतार् की उपिस्थित सुिनि्ात करने हेतु सम्मन आदेश जारी िकया गया परन्तु अिभयु्व/िनगरानीकतार् िव्षान िवचारण न्यायालय के सम्ष उपिस्थत नहीं हुआ, िजसके उपरान्त िव्षान िवचारण न्यायालय िदनाक-29.04.2019 को अिभयु्व/ िनगरानीकतार् के िवरू्ध गैर जमानतीय वारन्ट जारी िकया गया। उपरो्व सम्मन आदेश िदनांिकत 15.04.2019 को िनगरानीकतार् ्षारा धारा-482 दण्ड ्ऺि्वया संिहता के अंतगर्त माननीय उच्च न्यायालय के सम्ष ्ऺाथर्नाप्ऴ ्ऺस्तुत करते हुये पुनः इस आधार पर चुनौती दी गयी िक सी०बी०आई० ्षारा अपने ्षे्ऴािधकार से बाहर जाते हुये रेगुलर के स दजर् िकया गया, जबिक माननीय उच्च न्यायालय ्षारा मामले की जाँच िकये जाने का आदेश िदया गया था। माननीय उच्च न्यायालय ्षारा अपने आदेश िदनािकत-16.05.2019 ्षारा यह आदेश िदया गया है िक अिभयु्व / िनगरानीकतार् के िवरू्ध कोई भी िववशकारी आदेश न िकया जाये और इस कारण से िव्षान िवचारण न्यायालय की कायर्वाही स्थिगत रही। िव्षान िवचारण न्यायालय िदनांक 12.10.2021 को आदेश पािरत करते हुये माननीय उच्चतम न्यायालय ्षारा Asian Resurfacing of Road Agency Private Limited and Another Vs. Central Bureau of Investigation reported in (2018) 16 SCC 299 के वाद मे िदये गये िदशा िनदरॏशों के अनुपालन में उपरो्व स्थगन आदेश को िर्व कर िदया गया। अिभयु्व / िनगरानीकतार् ्षारा उ्व िर्वी आदेश िदनािकत-12.10.2021 को चुनौती दी गयी। अिभयु्व/िनगरानीकतार् ्षारा माननीय सेशन न्यायालय में अि्षम जमानत ्ऺाथर्ना ्ऺस्तुत िकया गया, िजसे न्यायालय ्षारा अस्वीकार कर िदया गया था, पुनः अिभयु्व / िनगरानीकतार् ्षारा माननीय उच्च न्यायालय में धारा-438 दण्ड ्ऺि्वया संिहता के अंतगर्त अि्षम जमानत हेतु ्ऺाथर्ना िदया गया, िजसे माननीय उच्च न्यायालय ्षारा िदनांक -07.08.2023 7 A482 No. 2090 of 2025 को स्वीकार िकये जाने का आदेश पािरत िकया गया। प्ऴावली के अवलोकन से यह भी िविदत होता है िक िव्षान िवचारण न्यायालय ्षारा अिभयु्व/ िनगरानीकतार् के उन्मोचन ्ऺाथर्नाप्ऴ को प्ऴावली में उपलब्ध साष्यों का पिरशीलन करते हुये अपने मिस्तष्क का ्ऺयोग कर पयार्प्त साष्य पाये जाने के उपरान्त ही िविध की दृि्ि से िव्षान िवचारण न्यायालय ्षारा समुिचत आदेश िदनािकत-10.07.2024 पािरत करते हुये अिभयु्व / िनगरानीकतार् का उन्मोचन ्ऺाथर्नाप्ऴ अस्वीकार िकया गया है, िजसमें कोई भी अवैधािनकता नहीं है। अिभयोजन प्ष/सी०बी०आई० ्षारा अिभयु्व/िनगरानीकतार् के िवरु्ध आरोप प्ऴ, िववेचना के दौरान ्ऺकाश में आये साष्यों के आधार पर ही ्ऺस्तुत िकया गया है, न िक संभावनाओं के आधार पर। प्ऴावली के अवलोकन से यह भी िविदत होता है िक ्ऺस्तुत मामला वषर् 2013 से िवचाराधीन है। अिभयु्व / िनगरानीकतार् ्षारा मामले को िवलिम्बत करने के आशय से िव्षान िवचारण न्यायालय एवं माननीय उच्च न्यायालयों में िभन्न-िभन्न ्ऺाथर्नाप्ऴ ्ऺस्तुत िकये जाने के कारण िपछले लगभग 11 वषॏल से कोई भी न्याियक कायर्वाही आगे नहीं बढ़ सकी है। ्ऺस्तुत आपरािधक िनगरानी को अिभयु्व/िनगरानीकतार् ्षारा जानबूझकर िव्षान िवचारण न्यायालय की न्याियक ्ऺि्वया को बािधत एवं िवलिम्बत करने के िलये ्ऺस्तुत िकया गया है। प्ऴावली के अवलोकन से यह भी िविदत होता है िक प्ऴावली पर आरोप प्ऴ ्ऺस्तुत करने के उपरान्त उभयप्षों के िव्षान अिधव्वा ्षारा कोई भी मौिखक व दस्तावेजी साष्य ्ऺस्तुत नहीं िकया गया है। ्ऺस्तुत ्ऺकरण में उपलब्ध दस्तावेजी साष्य का मूल्यांकन करने पर यह पाया जाता है िक उपरो्व वाद में िनगरानीकतार्/अिभयु्व पर आरोप िवरिचत िकये जाने हेतु ्ऺथम दृ्िया पयार्प्त साष्य प्ऴावली पर िव्धमान है। िनगरानीकतार्/अिभयु्व दोषी है या िनदरॏष है इस तथ्य का िनधार्रण प्ऴावली पर सम्पूणर् साष्य आने के बाद िकया जायेगा। माननीय सवरॏच्च न्यायालय ने राजवीर िसह बनाम उ०्ऺ० राज्य 2006(55) एसीसी 318, पलवेन््श बनाम बलवेन््श 2009 (65) एसीसी 399 शोराज िसह अहलावत बनाम उ०्ऺ० राज्य एआईआर 2013 सुको 52 एवं राज्य बनाम ए. अरुण कु मार 2015 (88) एसीसी 301 सुको में अवधािरत िकया गया है िक आरोप िवरिचत करने के िलये ्ऺबल संदेह भी पयार्प्त है िजसके आधार पर आरोप गिठत करने के िलये तत्वों के सम्बन्ध में न्यायालय ्षारा उपधारणात्मक राय बनाई जा सकती है। ओमवती बनाम राज्य 2001 सुकोके (ि्व०) 685 में अवधािरत िकया गया है िक जहां अिभयु्व के िवरु्ध आरोप िवरिचत िकया जाता है वहां न्यायालय के िलये कारण अिभिलिखत करना आवश्यक नहीं है। न्यायालय के िलये कारण अिभिलिखत करना वहां जरूरी होता है जहां पर न्यायालय ्षारा अिभयु्व को उन्मोिचत िकया जाता है। उड़ीसा राज्य बनाम देवेन््श नाथ पाधी 2005 (51) एसीसी 209 सुको में तीन न्यायमूितगण की न्यायपीठ ने यह अवधािरत िकया है िक आरोप िवरिचत करने के ्ऺकम पर अिभयु्व ्षारा ्ऺस्तुत साम्षी / अिभलेख पर िवचार नहीं िकया जा सकता क्योंिक आरोप िवरिचत करने के ्ऺ्वम पर गुण दोष का परी्षण करने वाली िवस्तृत जांच अपेि्षत नहीं होती। तिमलनाडू राज्य बनाम एन सुरेशराजन 2014 (84) एसीसी 656 सुको के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ्षारा यह अवधािरत िकया गया है िक दण्ड ्ऺि्वया संिहता की धारा-227 के अधीन उन्मोचन आवेदन पर िवचार करते समय न्यायालय को यह मान कर चलना होगा िक अिभयोजन ्षारा अिभलेख पर लाई गई साम्षी सही है। पी० िवजयन बनाम के रल राज्य (2010) 2 सुकोके 398 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अवधािरत िकया है िक धारा-227 दं०्ऺ०सं० के अधीन उन्मोचन के ्ऺश्न पर िवचार करते समय यिद न्यायालय का यह िनष्कषर् िनकलता है िक अिभयु्व के िवरू्ध िवचारण हेतु अ्षसिरत होने 8 A482 No. 2090 of 2025 का पयार्प्त आधार है तो आरोप िवरिचत िकया जायेगा। इस ्ऺकम पर साष्य एवं सम्भा्िताओं का गहन मूल्यांकन नहीं िकया जायेगा। उन्मोचन आवेदन पर िवचार करते समय न्यायालय को यह िवचार करना नहीं होता िक िवचारण का अंत दोषिसि्ध में होगा अथवा दोषमुि्व में। माननीय उच्चतम न्यायालय ्षारा सज्जन कु मार बनाम सी०बी०आई० 2010 (9) एस०सी०सी० पृ्ष 368 के मामले में यह िस्धांत ्ऺितपािदत िकया गया है िक आरोप िवरिचत करते समय िवचारण न्यायालय अिभयोजन प्ष ्षारा ्ऺस्तुत िकए गए साष्यो के आधार पर यह िनष्कषर् देंगा िक क्या अपराध में संिलप्तता के गंभीर सन्देंह िव्यमान है। यिद उ्व तथ्य ्ऺमािणत है तभी आरोप िवरिचत िकया जायेंगा। मा्ऴ सन्देह के आधार पर आरोप िवरिचत नहीं िकया जायेगा। माननीय न्यायालय के उ्व दृ्िांत के पिर्ऺेष्य में ्ऺश्नगत ्ऺकरण का मूल्यांकन करने पर यह पाया जाता है िक बृहद संभावनाओ तथा गंभीर अपराध में संिलप्तता के सुसंगत साष्य अन्तगर्त धारा 173 दण्ड ्ऺिकया संिहता ्ऺस्तुत िकया गया है। माननीय न्यायालयों की उपरो्व िविध ्िवस्थाओं में ्ऺितपािदत िविधक िस्धान्तों व दण्ड ्ऺि्वया संिहता की धारा-397/399 (438/440 भारतीय नागिरक सुर्षा संिहता-2023) के ्ऺावधानों को म्देनजर रखते हुये तथा मामले के तथ्य एवं पिरिस्थितयों को दृि्िगत रखते हुये िनगरानीकतार् / अिभयु्व की ओर से ्ऺस्तुत िनगरानी में इस स्तर पर कोई भी िविधक बल नहीं है, तथा िव्षान िवशेष न्याियक मिजस््िेट ्ऺदूषण/सी०बी०आई० लखनऊ ्षारा पािरत आलोच्य आदेश िदनांक 10.07.2024 में कोई अशु्धता, अवैधता या अिनयिमतता नहीं पाई जाती है। आलोच्य आदेश िदनांिकत-10.07.2024 में िकसी ्ऺकार के हस्त्षेप की आवश्यकता नहीं है। अतः इस न्यायालय की राय में ्ऺस्तुत दािण्डक िनगरानी िनरस्त िकये जाने योग्य है। आदेश ्ऺस्तुत दािण्डक िनगरानी संख्या-489/2024 िनरस्त की जाती है। िव्षान िवशेष न्याियक मिजस््िेट ्ऺदूषण/सी०बी०आई० लखनऊ ्षारा पािरत आलोच्य आदेश िदनांक-10.07.2024 की पुि्ि की जाती है। िव्षान िवचारण न्यायालय को आदेिशत िकया जाता है िक के स न० -01/2013, आर०सी०न०-0532012S0007 को अितशी्स िविधनुसार िनस्तािरत िकया जाना सुिनि्ात करें। इस िनणर्य व आदेश की एक ्ऺित अनुपालनाथर् िव्षान िवचारण न्यायालय ्ऺेिषत हो तथा िव्षान िवचारण न्यायालय की प्ऴावली िनयमानुसार वापस की जाये, तथा िनगरानी प्ऴावली िनयमानुसार दािखल दफ्तर हो।"

8. Being aggrieved by the orders dated 10.07.2024 and 31.01.2025, the present application has been filed before this Court.

9. While pressing the present application for the main relief(s) sought, quoted above, the learned counsel for the applicant says that taking case of the prosecution/CBI on its face value as correct, though not correct, the applicant/an Advocate of this Court tenders unconditional apology and based upon the same prayers sought by the applicant/an Advocate including for quashing of the proceedings be allowed, as have been quashed by this Court in the case of an Advocate of this Court namely Phool Bux Singh.

10. In continuation, the learned counsel for the applicant says that Phool Bux Singh, Advocate was also charge-sheeted by the CBI and his discharge application was rejected by the Special Judicial Magistrate (C.B.I.) vide order dated 12.10.2015 and the said order was affirmed by Additional District Judge, Lucknow vide order dated 08.08.2018 passed 9 A482 No. 2090 of 2025 in Criminal Revision No. 472/2025 and thereafter Phool Bux Singh, Advocate approached this Court by means of filing an Application U/S 482 No. 5696 of 2018, which was allowed by this Court vide order dated 24.08.2022.

11. It is further stated that CBI opposed the prayer of Phool Bux Singh Advocate, through Sri Anurag Kumar Singh, learned Advocate appearing for CBI, who before this Court submitted that interpolation was committed in the record of this Court in judicial proceeding and thereafter the C.B.I. investigated the matter and filed the charge sheet as per the direction of this Court and this Court may pass appropriate orders in the facts and circumstances of the case and taking note of the entire aspects of the case the final order dated 24.08.2022, quashing the criminal proceedings pending against Phool Bux Singh, Advocate, was passed. The relevant paragraph of the final order dated 24.08.2022 reads as under:- "21. The facts are not disputed. There were interpolations in the certified copy of the order of this Court dated 13.10.2004 passed in Writ Petition No.5349 (S/S) of 1997. It is not in dispute that the Court is custodia legis of its proceeding and record. Interpolation was made in the order passed by this Court and, therefore, this Court is of the view that considering it is solitary case against the applicant herein and his conduct, as an Advocate, has been impeccable throughout, this Court, in exercising of inherent powers under Section 482 CrPC, is of the considered view that the application is liable to be allowed and the impugned proceedings and orders are liable to be quashed. "

12. He further submitted that the final order dated 24.08.2022 was impeached/assailed before the Hon'ble Apex Court in Special Leave to Appeal (Crl.) No(s). 2674-2675/2023 (State through Central Bureau of Investigation and Anr. vs. Phool Bux Singh and Anr.) and the Hon'ble Apex Court, upon due consideration of the facts of the said case, dismissed the said SLP vide order dated 27.11.2024, which reads as under:- "Upon hearing the counsel the court made the following ORDER

1. We are not inclined to interfere with the impugned judgment and order of the High Court; hence, the special leave petitions are dismissed.

2. Pending application(s), if any, shall stand disposed of."

13. He further submitted that in the instant case interpolation was not done in the Court's record and as such indulgence of this Court is required in the matter in the light of the order dated 24.08.2022 passed by this Court and also the order dated 27.11.2024 passed by the Hon'ble Apex Court. Prayer is to allow the instant application for the prayers sought including quashing of the entire criminal proceedings pending against the present applicant/an Advocate of this Court.

14. Sri Sri Anurag Kumar Singh, the learned counsel for the opposite 10 A482 No. 2090 of 2025 party/C.B.I. could not dispute the aforesaid.

15. Considered the aforesaid and also perused the record.

16. Upon due consideration of the aforesaid, this Court finds that interference the following fact(s)/reason(s):- is required. It the matter is for (i) The allegations against the applicant/an Advocate of this Court, is that he prepared the order of this Court dated 03.02.2011, a copy of which is annexed as Annexure No. 10 at page 151 to 152 of the paper book, alleged to be passed in Writ Petition No. Nill (M/S) of 2011. (ii) The criminal case is proceeding on the basis of photocopy of the order dated 03.02.2011, alleged to be prepared by the applicant/an Advocate of this Court. (iii) The original document i.e. original order dated 03.02.2011 has not been placed on record by C.B.I. (iv) The beneficiaries of the order dated 03.02.2011 have been exonerated by the C.B.I. (v) There is no evidence/material available with the C.B.I. connecting the applicant/an Advocate to the making of the fake document, as typewriter or computer related to preparation of document i.e. order dated 03.02.2011 in issue has not been recovered. In Sheila Sebastian vs. Jawaharaj and another, (2018) 7 SCC 581, the Hon'ble Apex Court has observed that the prosecution must establish that the accused made the fake document. This principle has also been taken note of by the Hon'ble Apex Court in the case of Jupally Lakshmikantha Reddy vs. State of Andhra Pradesh and another, 2025 SCC OnLine SC 1950. (vi) It is solitary case against the applicant herein and his conduct, as an Advocate, has been impeccable throughout and the applicant has also tendered unconditional apology.

17. For the foregoing reasons, this Court, in exercising of inherent powers under Section 482 CrPC, is of the considered view that the instant application is liable to be allowed and the impugned proceedings and orders dated 10.07.2024 and 31.01.2025 are liable to be quashed.

18. Ordered accordingly. December 10, 2025 Arun/- (Saurabh Lavania,J.) ARUN KUMAR GANGWAR High Court of Judicature at Allahabad, Lucknow Bench

This is the original judgment text as indexed from the source corpus. Always verify against the official court record before relying on it in a filing — you can do so on eCourts or the Supreme Court of India website. ← Search more judgments