✦ High Court of India · 17 Sep 2025

State of U.P v. Party

Case Details High Court of India · 17 Sep 2025

न्यायालय ्षारा िनणर्त Nadeem Ahamed vs. State of West Bengal, Criminal Appeal Nos. 3573-3574 of 2025 (Arising out of SLP (Crl.) Nos. 9446- 9447 of 2025), 2025:INSC:993 की तरफ भी न्यायालय का ध्यान आकृ ्ि कराया। पुनः उनका यह भी कथन है िक आवेदक की तरफ से यह आ्षासन िदया गया है िक वह कानून की ्ऺि्वया में सहयोग करने के िलए तैयार है और जब भी आवश्यकता होगी वह ईमानदारी से अदालत के सम्ष खुद को उपलब्ध कराएगा और उन सभी शतॏल को स्वीकार करने के िलए भी तैयार है जो न्यायालय उस पर अिधरोिपत करेगी। आवेदक िनदरॏष है तथा वह इस ्ऺकरण में िद० 04.02.2025 से कारागार में िनरु्ध है। इसिलए आवेदक को जमानत पर छोड़ िदया जाय।

9.(क) िव्षान अपर शासकीय अिधव्वा ्षारा जमानत ्ऺाथर्नाप्ऴ का िवरोध करते हुए कथन िकया िक ऐसे मामलों में आवेदक को जमानत नहीं दी जा सकती है। आवेदक के जमानत ्ऺाथर्नाप्ऴ के िवरोध के संबंध में उनके ्षारा िनम्निलिखत न्याय-िविधयों की तरफ न्यायालय का ध्यान आकृ ्ि कराया, जो िनम्न हैंः- “1. Union of India vs. Ratan Malik (2009) 2 SCC 624

2. Union of India vs. Ram Samujh and Another (1999) 9 SCC 429

3. Shushant Gupta vs. Union of India 2014 (3) ACR 2564

4. State of M.P. vs. Kajd (2001) 7 SCC 673

5. Union of India vs. Niyazuddin SK and Ors AIR 2017 SC 3932

6. State of Kerala and Ors vs. Rajesh and Ors AIR 2020 SC 721

7. Satpal Singh vs. State of Punjab MANU/SC/0413/2018,(2018) 12 SCC 813

8. Shailendra Kumar Gupta vs. State of U.P. MANU/UP/0653/2020” (ख). पुनः िव्षान अपर शासकीय अिधव्वा ्षारा कथन िकया गया है िक आवेदक के िव्षान अिधव्वा ्षारा िदल्ली उच्च न्यायालय के िजस िनणर्य का कथन िकया गया है, वह आपरािधक अपील के संबंध में है और एन.डी.पी.एस. अिधिनयम की धारा 37, 35, 67, 53-ए और 54 के म्देनजर, वह उस मामले पर लागू नहीं होगा जहां के वल जमानत पर िवचार शािमल है। माननीय सवरॏच्च न्यायालय ने Mohan Lal vs. State of Punjab, (2018) SCC Online SC 974 के मामले में अिभयोजन के ऐसे आचरण को बरकरार रखा है। माननीय िदल्ली उच्च न्यायालय ने स्थायी आदेश संख्या 1 वषर् 1989 के खंड 2.3, 2.5 और 2.6 को नजरअंदाज कर िदया है, जो इसके खंड 2.4 के अपवाद के रूप में कायर् करते हैं। हालाँिक, खण्ड 2.4 के वल परामशार्त्मक है, अिनवायर् नहीं है तथा इसमें ्ऺत्येक पैके ट से एक नमूना लेने का 5 BAIL No. 11861 of 2025 ्ऺावधान है। वतर्मान मामले में स्थायी आदेश के खंड 2.8 का अनुपालन िकया गया है। माननीय िदल्ली उच्च न्यायालय ्षारा उ्ध ृत िनणर्य में अिभयोजन प्ष ्षारा संदिभत िनणर्यों पर िवचार नहीं िकया गया है। नमूना लेने से संबंिधत व्व्ि जमानत ्ऺाथर्नाप्ऴ में िनिहत तकॏल से परे है और पंचनामा, बयानों का अंकन आिद की अन्य कानूनी आवश्यकताओं का वतर्मान मामले में पूरी तरह से पालन िकया गया है।

10. आवेदक की तरफ से ्ऺस्तुत उपरो्व तकॏल पर िवचार करने के बाद, इस न्यायालय ने पाया िक आवेदक की तरफ से यह तकर् िक स्थायी आदेश के खंड 2.4 का अनुपालन नहीं िकया गया था और आवेदक की कार से अिभयोजन प्ष ्षारा किथत रूप से बरामद िकए गए सभी 38 पैके टों से कोई ्ऺितिनिध नमूने नहीं िलए गए थे, अच्छी तरह से स्थािपत है। Noor Aga Vs. State of Punjab and Another, 2008 (3) JIC 640 (SC) के मामले में सवरॏच्च न्यायालय ने िव्षान अपर शासकीय अिधव्वा के इस उ्तर को स्वीकार नहीं िकया िक स्थायी आदेश का खंड 2.4 के वल परामशार्त्मक है, अिनवायर् एवं बाध्यकारी नहीं है। माननीय सवरॏच्च न्यायालय ने ्ऺस्तर संख्या 123, 124 और 125 में यह माना है िक उ्व स्थायी आदेश और िविधक स्वीकृ ित ्ऺाप्त ्ऺािधकारी ्षारा जारी अन्य िदशा-िनदरॏशों का अधीनस्थ ्ऺािधकािरयों ्षारा अनुपालन िकया जाना आवश्यक है। उ्व ्ऺस्तर िनम्न हैंः- “123. Guidelines issued should not only be substantially complied, but also in a case involving penal proceedings, vis--vis a departmental proceeding, rigours of such guidelines may be insisted upon. Another important factor which must be borne in mind is as to whether such directions have been issued in terms of the provisions of the statute or not. When directions are issued by an authority having the legal sanction granted therefor, it becomes obligatory on the part of the subordinate authorities to comply therewith.

न्यायालय ्षारा िनणर्त Nadeem Ahamed vs. State of West Bengal, Criminal Appeal Nos. 3573-3574 of 2025 (Arising out of SLP (Crl.) Nos. 9446- 9447 of 2025), 2025:INSC:993 की तरफ भी न्यायालय का ध्यान आकृ ्ि कराया। पुनः उनका यह भी कथन है िक आवेदक की तरफ से यह आ्षासन िदया गया है िक वह कानून की ्ऺि्वया में सहयोग करने के िलए तैयार है और जब भी आवश्यकता होगी वह ईमानदारी से अदालत के सम्ष खुद को उपलब्ध कराएगा और उन सभी शतॏल को स्वीकार करने के िलए भी तैयार है जो न्यायालय उस पर अिधरोिपत करेगी। आवेदक िनदरॏष है तथा वह इस ्ऺकरण में िद० 04.02.2025 से कारागार में िनरु्ध है। इसिलए आवेदक को जमानत पर छोड़ िदया जाय।

9.(क) िव्षान अपर शासकीय अिधव्वा ्षारा जमानत ्ऺाथर्नाप्ऴ का िवरोध करते हुए कथन िकया िक ऐसे मामलों में आवेदक को जमानत नहीं दी जा सकती है। आवेदक के जमानत ्ऺाथर्नाप्ऴ के िवरोध के संबंध में उनके ्षारा िनम्निलिखत न्याय-िविधयों की तरफ न्यायालय का ध्यान आकृ ्ि कराया, जो िनम्न हैंः- “1. Union of India vs. Ratan Malik (2009) 2 SCC 624

2. Union of India vs. Ram Samujh and Another (1999) 9 SCC 429

3. Shushant Gupta vs. Union of India 2014 (3) ACR 2564

4. State of M.P. vs. Kajd (2001) 7 SCC 673

5. Union of India vs. Niyazuddin SK and Ors AIR 2017 SC 3932

6. State of Kerala and Ors vs. Rajesh and Ors AIR 2020 SC 721

7. Satpal Singh vs. State of Punjab MANU/SC/0413/2018,(2018) 12 SCC 813

8. Shailendra Kumar Gupta vs. State of U.P. MANU/UP/0653/2020” (ख). पुनः िव्षान अपर शासकीय अिधव्वा ्षारा कथन िकया गया है िक आवेदक के िव्षान अिधव्वा ्षारा िदल्ली उच्च न्यायालय के िजस िनणर्य का कथन िकया गया है, वह आपरािधक अपील के संबंध में है और एन.डी.पी.एस. अिधिनयम की धारा 37, 35, 67, 53-ए और 54 के म्देनजर, वह उस मामले पर लागू नहीं होगा जहां के वल जमानत पर िवचार शािमल है। माननीय सवरॏच्च न्यायालय ने Mohan Lal vs. State of Punjab, (2018) SCC Online SC 974 के मामले में अिभयोजन के ऐसे आचरण को बरकरार रखा है। माननीय िदल्ली उच्च न्यायालय ने स्थायी आदेश संख्या 1 वषर् 1989 के खंड 2.3, 2.5 और 2.6 को नजरअंदाज कर िदया है, जो इसके खंड 2.4 के अपवाद के रूप में कायर् करते हैं। हालाँिक, खण्ड 2.4 के वल परामशार्त्मक है, अिनवायर् नहीं है तथा इसमें ्ऺत्येक पैके ट से एक नमूना लेने का 5 BAIL No. 11861 of 2025 ्ऺावधान है। वतर्मान मामले में स्थायी आदेश के खंड 2.8 का अनुपालन िकया गया है। माननीय िदल्ली उच्च न्यायालय ्षारा उ्ध ृत िनणर्य में अिभयोजन प्ष ्षारा संदिभत िनणर्यों पर िवचार नहीं िकया गया है। नमूना लेने से संबंिधत व्व्ि जमानत ्ऺाथर्नाप्ऴ में िनिहत तकॏल से परे है और पंचनामा, बयानों का अंकन आिद की अन्य कानूनी आवश्यकताओं का वतर्मान मामले में पूरी तरह से पालन िकया गया है।

10. आवेदक की तरफ से ्ऺस्तुत उपरो्व तकॏल पर िवचार करने के बाद, इस न्यायालय ने पाया िक आवेदक की तरफ से यह तकर् िक स्थायी आदेश के खंड 2.4 का अनुपालन नहीं िकया गया था और आवेदक की कार से अिभयोजन प्ष ्षारा किथत रूप से बरामद िकए गए सभी 38 पैके टों से कोई ्ऺितिनिध नमूने नहीं िलए गए थे, अच्छी तरह से स्थािपत है। Noor Aga Vs. State of Punjab and Another, 2008 (3) JIC 640 (SC) के मामले में सवरॏच्च न्यायालय ने िव्षान अपर शासकीय अिधव्वा के इस उ्तर को स्वीकार नहीं िकया िक स्थायी आदेश का खंड 2.4 के वल परामशार्त्मक है, अिनवायर् एवं बाध्यकारी नहीं है। माननीय सवरॏच्च न्यायालय ने ्ऺस्तर संख्या 123, 124 और 125 में यह माना है िक उ्व स्थायी आदेश और िविधक स्वीकृ ित ्ऺाप्त ्ऺािधकारी ्षारा जारी अन्य िदशा-िनदरॏशों का अधीनस्थ ्ऺािधकािरयों ्षारा अनुपालन िकया जाना आवश्यक है। उ्व ्ऺस्तर िनम्न हैंः- “123. Guidelines issued should not only be substantially complied, but also in a case involving penal proceedings, vis--vis a departmental proceeding, rigours of such guidelines may be insisted upon. Another important factor which must be borne in mind is as to whether such directions have been issued in terms of the provisions of the statute or not. When directions are issued by an authority having the legal sanction granted therefor, it becomes obligatory on the part of the subordinate authorities to comply therewith.

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