✦ High Court of India

Ranvijay v. Ravi Kumar) under Section

Case Details High Court of India
Court
High Court of India
Length
1,964 words

1. Heard Sri Mahender Pal Singh Yadav, learned counsel for the applicant as well as Sri Moti Lal, learned AGA for the State/opposite party no.1.

2. In view of the order, which is being proposed to be passed, notices are not being issued to O.P. No. 2.

3. This application under Section 528 of the B.N.S.S. has been filed by the applicant to quash the the Impugned Order dated 26.03.2025 passed by Additional Chief Judicial Magistrate/Additional Civil Judge, (SD), Court No. 3, Kanpur Dehat in Case No. 1734 of 2021 (Ranvijay Vs Ravi Kumar) under Section 138 Ν.Ι. Act Police Station: District: Kanpur Dehat.

4. The case of the applicant is that a complaint stood lodged by the opposite party no.2 on 23.6.2021 under Section 138 of the N.I. Act against the applicant with relation to dishonour of the cheque bearing no.146088 dated 24.2.2021 for an amount of Rs.10,63,885/- followed by a statutory demand notice thereafter during the pendency of the proceeding an application came to be preferred by the opposite party no.2 for awarding interim compensation in view of the provisions contained under Section 143A of the N.I. Act which on objection came to be decided on

26.3.2025 order whereof was corrected on 30.7.2025 whereby the applicant was directed to deposit an amount of Rs.10,6388.50 being 10% of the interim compensation. 2 NA528 No. 37538 of 2025

5. Questioning both the orders, the present application has been preferred.

6. Learned counsel for the applicant has submitted that the orders impugned in the present application cannot be sustained for a single moment particularly in view of the fact that it is not in conformity and in consonance with the guide lines laid down by the the Hon'ble Apex Court in the case of Rakesh Ranjan Srivastava vs. State of Jharkhand 2024 INSC 205. Further submission is that the criteria as the yardsticks in order to determine as to whether the complainant is entitled to interim compensation has not been adhered to.

7. Learned AGA on the other hand submits that once the cheques stood drawn then the presumption under Section 139 of the N.I.Act, however, he could not dispute the fact that the law in this regard is crystalized in Rakesh Ranjan Srivastava (Supra). He further submits that the order be set aside, matter be remitted back to the court below to pass a fresh order.

8. I have heard the submissions so made across the bar and perused the record carefully. The orders dated 26.3.2025 and 30.7.2025 are quoted herein under:- िदनांक- 26.03.2025 पत्रावली पेश हुई। पुकार कराई गई। पत्रावली वास्ते आदेशाथर् प्राथर्ना पत्र िदनांिकत 30.11.2024 िनयत है, िजसपर पूवर् ितिथ में पिरवादी मुकदमा के िवद्वान अिधवक्ता को सुना गया है, िजसका िनस्तारण िनम्नवत है। पिरवादी रणिवजय िसह की ओर से प्राथर्ना पत्र िदनांिकत 30.11.2024 प्रस्तुत करते हुए मुख्य रूप से यह अिभकथन िकये गये हैं िक उसके द्वारा यह मुकदमा िदनांक 10.08.2021 को प्रस्तुत िकया गया था। उपरोक्त मामला मु० 10,63,885/- रुपये का है। अतः ऐसी िस्थित में प्रस्तुत प्रकरण की पिरिस्थितयों को देखते हुए पिरवादी को िवपक्षी से तीस प्रितशत प्रितकर की रािश िदलाया जाना अित आवश्यक है। अतः पिरवादर् की ओर से प्रस्तुत प्राथर्ना पत्र को स्वीकार करते हुए पिरवादी को मूल चेक धनरािश 10,63,885/-का तीस प्रितशत अन्तिरम प्रितकर िदलाये जाने का आदेश पािरत करने की याचना की गई है। पिरवादी के उक्त प्राथर्ना पत्र के िवरुद्ध िवपक्षी रिव कु मार द्वारा अपनी आपित्त मुख्यतः इस आशय की प्रस्तुत की गयी है िक उसकी खाद की दुकान पर वादी मुनीम का कायर् करता रहा है तथा उसकी दुकान पर खाता बही, िलखा-पढ़़़़ी से लेकर दुकान के माल के खरीद-फरोख्त व रुपयों का भुगतान, िबिलग आिद का कायर् वदी ही करता रहा है। लंबे अरसे से कायर् करने के कारण उसने वादी को अपने बैंक से संबंिधत हस्ताक्षरेत चेकबुक व पासबुक आिद वादी को सौंप रखे थे तािक उसकी अनुपिस्थित में माल की खरीद-फरोख्त तथा व्यापािरयों से रुपयों का लेनदेन में िकसी प्रकार की कोई रुकावट न आये। वादी ने उसकी दुकान ने िदसंबर 2020 में िनजी कारणों का हवाला देते हुए उसकी दुकान पर कायर् करना बंद कर िदया। वादी ने बेईमानीपूवर्क चोरी से प्राथीर् की हस्ताक्षिरत बैंक चेक अपने पास रख ली और उक्त चेक का दुरुपयोग िकया अतः पिरवादी के उक्त प्राथर्ना पत्र को िनरस्त िकये जाने की याचना की गयी है। सुना एवं पत्रावली का अवलोकन िकया। पत्रावली के अवलोकन से िविदत है िक पिरवादी रणिवजय िसह द्वारा यह पिरवाद िवपक्षी रिव कु मार के 3 NA528 No. 37538 of 2025 िवरुद्ध अंतगर्त धारा 138 एन०आई० एक्ट के तहत योिजत िकया गया है। पिरवादी द्वारा प्राथर्ना पत्र िदनांिकत 30.11.2024 प्रस्तुत कर याचना की गई है िक उसे मूल चेक धनरािश 10,63,885/- की तीस प्रितशत धनरािश िवपक्षी से िदलायी जावे। इस संबंध में धारा-143 (क) परक्राम्य िलखत अिधिनयम का अवलोकन िकया। धारा-143 (क) परक्राम्य िलखत अिधिनयम के अनुसार - धारा-143(क) अंतिरम प्रितकर का िनदेश देने की शिक्त (1) दंड प्रिक्रया संिहता, 1973 (1974) का 2) नं अंतिवष्ट िकसी बात के होते हुए भी, धारा 138 के अधीन िकसी अपराध का िवचारण करने वाला न्यायालय चेक के लेखीवाल को- (क) संिक्षप्त िवचारण या समन मामले में, जहां उसने पिरवाद में िकए गए अिभयोग का दोषी नहीं होने का अभ्वाक् िकया हो; और (ख) अन्य िकसी मामले में, आरोप िवरिचत िकए जाने पर, पिरवादी को अंतिरम प्रितकर का संदाय करने का आदेश दे सके गा। (2) उपधारा (1) के अधीन अंतिरम प्रितकर बैंक की रकम के बीस प्रितशत से अिधक नहीं होगा। (3) अंतिरम प्रितकर का संदाय, उपधारा (1) के अधीन जारी आदेश की तारीख से साठ िदन के भीतर या चेक के लेखीवाल द्वारा पयार्प्त कारण दिशत िकए जाने पर तीस िदन से अनिधक की ऐसी और अविध के भीतर, िजसका न्यायालय द्वारा िनदेश िदया जाए, िकया जाएगा। (4) यिद चेक के लेखीवाल को दोषमुक्त क्रर िदया जाता है, तो न्यायालय पिरवादी को प्रितकर की अंतिरम रकम लेखीवाल को, आदेश की तारीख से साठ िदन के भीतर या पिरवादी द्वारा पयार्प्त कारण दिशत िकए जाने पर तीस िदन से अनिधक की ऐसी और अविध के भीतर, िजसका न्यायालय द्वारा िनदेश िदया जाए, सुसंगत िवत्तीय वषर् के प्रारंभ पर प्रचिलत भारतीय िरजवर् बैंक द्वारा यथा प्रकािशत बैंक दर से व्याज सिहत प्रितसंदाय करने का िनदेश देगा। (5) इस धारा के अधीन संदेय अंतिरम प्रितकर इस प्रकार वसूल िकया जा सके गा, मानो यह दंड प्रिक्रया संिहता, 1973 (1974 का 2) की धारा 421 के अधीन कोई जुमार्ना था। त्यागात (6) धारा 138 के अधीन अिधरोिपत जमिन की रकम या दंड प्रिक्रया संिहता 1973 (1974 का 2) की चारा 357 के अधीन अिधिनणीर्त प्रितकर की रकम में से इस धारा के अधीन अंतिरम प्रितकर के रूप में संदत्त या वसूल की गई रकम घटा दी जाएगी। अतः उक्त प्रावधान के अवलोकन से स्पष्ट है िक समुिचत मामले में न्यायालय को यह वैवेिकक शिक्त प्राप्त है िक वह पिरवादी को चेक की विणत धनरािश के अिधकतम बीस प्रितशत तक की धनरािश अंतिरम प्रितकर के रूप में प्रदान कर सकता है। अतः इस वाद की पिरिस्थितयों में पिरवादी को चेक िदनांिकत 24.02.2021 में विणत धनरािश का दस प्रितशत अंतिरम प्रितकर के रूप में प्रदान करवाया जाना न्यायोिचत प्रतीत हो रहा है। अतः िवपक्षी रिव कु मार पुत्र ओमप्रकाश को आदेिशत िकया जाता है िक वह धारा-143 (क) परक्राम्य िलखत अिधिनयम के अनुसार पिरवादी रणिवजय िसह को भारतीय स्टेट बैंक की चेक सं०- 146088, िदनांिकत 24.02.2021, मु० 1063885/- (जो िक उसने पिरवादी रणिवजय िसह के नाम हस्ताक्षिरत करके दी थी) का दस प्रितशत अथार्त् मु० 10,638.85/- रुपये पिरवादी को अगले साठ िदवस के अन्दर िनयमानुसार िदया जाना सुिनिश्चत करें। पत्रावली वास्ते अिग्रम आदेश िदनांक 25.04.2025 को पेश हो। िदनांक- 30.07.2025 पत्रावली पेश हुई। पुकार करायी गयी। यह पत्रावली वास्ते आदेशाथर् िनयत है। पिरवादी रणिवजय िसह की ओर से प्राथर्ना पत्र िदनांिकत 04.06.2025 इस आशय का प्रस्तुत िकया है िक वाद उपरोक्त में न्यायालय द्वारा िदनांक 26.03.2025 को प्रितवादी रिव कु मार पुत्र ओमप्रकाश को प्रश्नगत चेक में विणत धनरािश 1063885/- रुपये के दस प्रितशत अथार्त 106388.5/- रुपये अंतिरम प्रितकर के रूप में पिरवादी रणिवजय िसह को िदलाये जाने का आदेश पािरत िकया था, परन्तु टाईिपग िमस्टेक के कारण 106388.5/- रुपये के स्थान पर 10638.85/-रुपया अंिकत हो गया, िजसे संशोिधत िकये जाने की याचना पिरवादी की ओर से की गयी है। 4 NA528 No. 37538 of 2025 सुना तथा पत्रावली का अवलोकन िकया। पत्रावली के अवलोकन से िविदत है िक पिरवादी रणिवजय िसह के द्वारा यह पिरवाद िवपक्षी रिव कु मार के िवरुद्ध अंतगर्त धारा 138 एन०आई० एक्ट में प्रस्तुत िकया गया है। पिरवाद उपरोक्त में न्यायालय द्वारा िदनांक 26.03.2025 को प्रितवादी रिव कु मार पुत्र ओमप्रकाश को प्रश्नगत चे विणत धनरािश 1063885/- रुपये के दस प्रितशत अथार्त 106388.5/- रुपये अंतिरम प्रितकर के रूप में पिरवादी रणिवजय िसह को िदलाये जाने का आदेश पािरत िकया गया था, परन्तु त्रुिटवेश उक्त आदेश में 106388.5/- रुपये के स्थान पर 10638.85/- रुपये टंिकत हो गया, जो िक मात्र एक टंकण त्रुिट है. िजसे दुरुस्त िकया जाना न्यायिहत में है। इस संबंध में दण्ड प्रिक्रया की प्राজানা 362 में यह उिल्लिखत है िक न्यायालय का अपने िनणर्य में। में पिरवतर्न न करना इस संिहता या तत्समय प्रवृत्त िकसी अन्य िविध द्वारा जैसा उपबंिधत है, उसके िसवाय कोई न्यायालय जब उपने िकसी मामले को िनपटाने के िलये अपने िनणर्य या अंितम आदेश पर हस्ताक्षर कर िदये हैं िलिपकीय या गिणतीय भूल को ठीक करने के िसवाय उसमें कोई पिरवतर्न नहीं करेगा या उसका पुनिवलोकन नहीं करेगा। अतः मामले के समस्त तथ्यों एवं पिरिस्थितयों को दृिष्टगत रखते हुये धारा 362 दं०प्र०सं० के तहत पिरवाद उपरोक्त में इस न्यायालय द्वारा पािरत आदेश िदनांिकत 26.03.2025 के पैरा अंितम पैरा की चौथी पंिक्त में 10,638.85/ के स्थान पर 10,63,88.5/- का संशोधन िकया जाना न्यायिहत में आवश्यक है। आदेश पिरवादी रणिवजय िसह के द्वारा प्रस्तुत प्राथर्ना पत्र िदनांिकत 04.06.2025 स्वीकार िकया जाता है। धारा 362 दं०प्र०सं० के आलोक में न्यायालय द्वारा पािरत आदेश िदनांिकत 26.03.2025 में आदेश के अंितम पैरा में जहाँ '10,638.85/- अंिकत है के स्थान पर '10,63,88.5/- संशोिधत िकया जाये। पत्रावली वास्ते साक्ष्य पिरवादी िदनांक 27.08.2025 को पेश हो।

9. In the present case in hand, the Court finds that there has been no consideration of the parameter pertaining to the financial distress of the accused which is one of the consideration when a decision is to be taken for payment of interim compensation post evaluation on the merits on prima facie basis of the case of the complainant and the accused. The quantum of compensation has also not been taken note of and further the Court finds that there is no consideration with regard to the several factors such as nature of the transaction relationship between the accused and the complainant. Since the said exercise is completely lacking, thus this Court has no option but to set aside the order dated 26.3.2025 according to interim compensation to the opposite party no.2.

10. Accordingly, the present application stands disposed of.

11. The order dated 26.03.2025 passed by Additional Chief Judicial Magistrate/Additional Civil Judge, (SD), Court No. 3, Kanpur Dehat in Case No. 1734 of 2021 (Ranvijay Vs Ravi Kumar) under Section 138 Ν.Ι. Act Police Station: District: Kanpur Dehat is set aside.

12. The matter is remitted to back to the court below to pass fresh order with most expedition. 5 NA528 No. 37538 of 2025

13. In order to facilitate expeditious disposal of the matter, the applicant is to furnish the certified copy of the order by 10.10.2025.

14. The court below post remand shall pass a fresh order strictly in accordance with law principle laid down in the case of Rakesh Ranjan Srivastava (supra). September 25, 2025 piyush (Vikas Budhwar,J.)

1. Heard Sri Mahender Pal Singh Yadav, learned counsel for the applicant as well as Sri Moti Lal, learned AGA for the State/opposite party no.1.

2. In view of the order, which is being proposed to be passed, notices are not being issued to O.P. No. 2.

3. This application under Section 528 of the B.N.S.S. has been filed by the applicant to quash the the Impugned Order dated 26.03.2025 passed by Additional Chief Judicial Magistrate/Additional Civil Judge, (SD), Court No. 3, Kanpur Dehat in Case No. 1734 of 2021 (Ranvijay Vs Ravi Kumar) under Section 138 Ν.Ι. Act Police Station: District: Kanpur Dehat.

4. The case of the applicant is that a complaint stood lodged by the opposite party no.2 on 23.6.2021 under Section 138 of the N.I. Act against the applicant with relation to dishonour of the cheque bearing no.146088 dated 24.2.2021 for an amount of Rs.10,63,885/- followed by a statutory demand notice thereafter during the pendency of the proceeding an application came to be preferred by the opposite party no.2 for awarding interim compensation in view of the provisions contained under Section 143A of the N.I. Act which on objection came to be decided on

26.3.2025 order whereof was corrected on 30.7.2025 whereby the applicant was directed to deposit an amount of Rs.10,6388.50 being 10% of the interim compensation. 2 NA528 No. 37538 of 2025

5. Questioning both the orders, the present application has been preferred.

6. Learned counsel for the applicant has submitted that the orders impugned in the present application cannot be sustained for a single moment particularly in view of the fact that it is not in conformity and in consonance with the guide lines laid down by the the Hon'ble Apex Court in the case of Rakesh Ranjan Srivastava vs. State of Jharkhand 2024 INSC 205. Further submission is that the criteria as the yardsticks in order to determine as to whether the complainant is entitled to interim compensation has not been adhered to.

7. Learned AGA on the other hand submits that once the cheques stood drawn then the presumption under Section 139 of the N.I.Act, however, he could not dispute the fact that the law in this regard is crystalized in Rakesh Ranjan Srivastava (Supra). He further submits that the order be set aside, matter be remitted back to the court below to pass a fresh order.

8. I have heard the submissions so made across the bar and perused the record carefully. The orders dated 26.3.2025 and 30.7.2025 are quoted herein under:- िदनांक- 26.03.2025 पत्रावली पेश हुई। पुकार कराई गई। पत्रावली वास्ते आदेशाथर् प्राथर्ना पत्र िदनांिकत 30.11.2024 िनयत है, िजसपर पूवर् ितिथ में पिरवादी मुकदमा के िवद्वान अिधवक्ता को सुना गया है, िजसका िनस्तारण िनम्नवत है। पिरवादी रणिवजय िसह की ओर से प्राथर्ना पत्र िदनांिकत 30.11.2024 प्रस्तुत करते हुए मुख्य रूप से यह अिभकथन िकये गये हैं िक उसके द्वारा यह मुकदमा िदनांक 10.08.2021 को प्रस्तुत िकया गया था। उपरोक्त मामला मु० 10,63,885/- रुपये का है। अतः ऐसी िस्थित में प्रस्तुत प्रकरण की पिरिस्थितयों को देखते हुए पिरवादी को िवपक्षी से तीस प्रितशत प्रितकर की रािश िदलाया जाना अित आवश्यक है। अतः पिरवादर् की ओर से प्रस्तुत प्राथर्ना पत्र को स्वीकार करते हुए पिरवादी को मूल चेक धनरािश 10,63,885/-का तीस प्रितशत अन्तिरम प्रितकर िदलाये जाने का आदेश पािरत करने की याचना की गई है। पिरवादी के उक्त प्राथर्ना पत्र के िवरुद्ध िवपक्षी रिव कु मार द्वारा अपनी आपित्त मुख्यतः इस आशय की प्रस्तुत की गयी है िक उसकी खाद की दुकान पर वादी मुनीम का कायर् करता रहा है तथा उसकी दुकान पर खाता बही, िलखा-पढ़़़़ी से लेकर दुकान के माल के खरीद-फरोख्त व रुपयों का भुगतान, िबिलग आिद का कायर् वदी ही करता रहा है। लंबे अरसे से कायर् करने के कारण उसने वादी को अपने बैंक से संबंिधत हस्ताक्षरेत चेकबुक व पासबुक आिद वादी को सौंप रखे थे तािक उसकी अनुपिस्थित में माल की खरीद-फरोख्त तथा व्यापािरयों से रुपयों का लेनदेन में िकसी प्रकार की कोई रुकावट न आये। वादी ने उसकी दुकान ने िदसंबर 2020 में िनजी कारणों का हवाला देते हुए उसकी दुकान पर कायर् करना बंद कर िदया। वादी ने बेईमानीपूवर्क चोरी से प्राथीर् की हस्ताक्षिरत बैंक चेक अपने पास रख ली और उक्त चेक का दुरुपयोग िकया अतः पिरवादी के उक्त प्राथर्ना पत्र को िनरस्त िकये जाने की याचना की गयी है। सुना एवं पत्रावली का अवलोकन िकया। पत्रावली के अवलोकन से िविदत है िक पिरवादी रणिवजय िसह द्वारा यह पिरवाद िवपक्षी रिव कु मार के 3 NA528 No. 37538 of 2025 िवरुद्ध अंतगर्त धारा 138 एन०आई० एक्ट के तहत योिजत िकया गया है। पिरवादी द्वारा प्राथर्ना पत्र िदनांिकत 30.11.2024 प्रस्तुत कर याचना की गई है िक उसे मूल चेक धनरािश 10,63,885/- की तीस प्रितशत धनरािश िवपक्षी से िदलायी जावे। इस संबंध में धारा-143 (क) परक्राम्य िलखत अिधिनयम का अवलोकन िकया। धारा-143 (क) परक्राम्य िलखत अिधिनयम के अनुसार - धारा-143(क) अंतिरम प्रितकर का िनदेश देने की शिक्त (1) दंड प्रिक्रया संिहता, 1973 (1974) का 2) नं अंतिवष्ट िकसी बात के होते हुए भी, धारा 138 के अधीन िकसी अपराध का िवचारण करने वाला न्यायालय चेक के लेखीवाल को- (क) संिक्षप्त िवचारण या समन मामले में, जहां उसने पिरवाद में िकए गए अिभयोग का दोषी नहीं होने का अभ्वाक् िकया हो; और (ख) अन्य िकसी मामले में, आरोप िवरिचत िकए जाने पर, पिरवादी को अंतिरम प्रितकर का संदाय करने का आदेश दे सके गा। (2) उपधारा (1) के अधीन अंतिरम प्रितकर बैंक की रकम के बीस प्रितशत से अिधक नहीं होगा। (3) अंतिरम प्रितकर का संदाय, उपधारा (1) के अधीन जारी आदेश की तारीख से साठ िदन के भीतर या चेक के लेखीवाल द्वारा पयार्प्त कारण दिशत िकए जाने पर तीस िदन से अनिधक की ऐसी और अविध के भीतर, िजसका न्यायालय द्वारा िनदेश िदया जाए, िकया जाएगा। (4) यिद चेक के लेखीवाल को दोषमुक्त क्रर िदया जाता है, तो न्यायालय पिरवादी को प्रितकर की अंतिरम रकम लेखीवाल को, आदेश की तारीख से साठ िदन के भीतर या पिरवादी द्वारा पयार्प्त कारण दिशत िकए जाने पर तीस िदन से अनिधक की ऐसी और अविध के भीतर, िजसका न्यायालय द्वारा िनदेश िदया जाए, सुसंगत िवत्तीय वषर् के प्रारंभ पर प्रचिलत भारतीय िरजवर् बैंक द्वारा यथा प्रकािशत बैंक दर से व्याज सिहत प्रितसंदाय करने का िनदेश देगा। (5) इस धारा के अधीन संदेय अंतिरम प्रितकर इस प्रकार वसूल िकया जा सके गा, मानो यह दंड प्रिक्रया संिहता, 1973 (1974 का 2) की धारा 421 के अधीन कोई जुमार्ना था। त्यागात (6) धारा 138 के अधीन अिधरोिपत जमिन की रकम या दंड प्रिक्रया संिहता 1973 (1974 का 2) की चारा 357 के अधीन अिधिनणीर्त प्रितकर की रकम में से इस धारा के अधीन अंतिरम प्रितकर के रूप में संदत्त या वसूल की गई रकम घटा दी जाएगी। अतः उक्त प्रावधान के अवलोकन से स्पष्ट है िक समुिचत मामले में न्यायालय को यह वैवेिकक शिक्त प्राप्त है िक वह पिरवादी को चेक की विणत धनरािश के अिधकतम बीस प्रितशत तक की धनरािश अंतिरम प्रितकर के रूप में प्रदान कर सकता है। अतः इस वाद की पिरिस्थितयों में पिरवादी को चेक िदनांिकत 24.02.2021 में विणत धनरािश का दस प्रितशत अंतिरम प्रितकर के रूप में प्रदान करवाया जाना न्यायोिचत प्रतीत हो रहा है। अतः िवपक्षी रिव कु मार पुत्र ओमप्रकाश को आदेिशत िकया जाता है िक वह धारा-143 (क) परक्राम्य िलखत अिधिनयम के अनुसार पिरवादी रणिवजय िसह को भारतीय स्टेट बैंक की चेक सं०- 146088, िदनांिकत 24.02.2021, मु० 1063885/- (जो िक उसने पिरवादी रणिवजय िसह के नाम हस्ताक्षिरत करके दी थी) का दस प्रितशत अथार्त् मु० 10,638.85/- रुपये पिरवादी को अगले साठ िदवस के अन्दर िनयमानुसार िदया जाना सुिनिश्चत करें। पत्रावली वास्ते अिग्रम आदेश िदनांक 25.04.2025 को पेश हो। िदनांक- 30.07.2025 पत्रावली पेश हुई। पुकार करायी गयी। यह पत्रावली वास्ते आदेशाथर् िनयत है। पिरवादी रणिवजय िसह की ओर से प्राथर्ना पत्र िदनांिकत 04.06.2025 इस आशय का प्रस्तुत िकया है िक वाद उपरोक्त में न्यायालय द्वारा िदनांक 26.03.2025 को प्रितवादी रिव कु मार पुत्र ओमप्रकाश को प्रश्नगत चेक में विणत धनरािश 1063885/- रुपये के दस प्रितशत अथार्त 106388.5/- रुपये अंतिरम प्रितकर के रूप में पिरवादी रणिवजय िसह को िदलाये जाने का आदेश पािरत िकया था, परन्तु टाईिपग िमस्टेक के कारण 106388.5/- रुपये के स्थान पर 10638.85/-रुपया अंिकत हो गया, िजसे संशोिधत िकये जाने की याचना पिरवादी की ओर से की गयी है। 4 NA528 No. 37538 of 2025 सुना तथा पत्रावली का अवलोकन िकया। पत्रावली के अवलोकन से िविदत है िक पिरवादी रणिवजय िसह के द्वारा यह पिरवाद िवपक्षी रिव कु मार के िवरुद्ध अंतगर्त धारा 138 एन०आई० एक्ट में प्रस्तुत िकया गया है। पिरवाद उपरोक्त में न्यायालय द्वारा िदनांक 26.03.2025 को प्रितवादी रिव कु मार पुत्र ओमप्रकाश को प्रश्नगत चे विणत धनरािश 1063885/- रुपये के दस प्रितशत अथार्त 106388.5/- रुपये अंतिरम प्रितकर के रूप में पिरवादी रणिवजय िसह को िदलाये जाने का आदेश पािरत िकया गया था, परन्तु त्रुिटवेश उक्त आदेश में 106388.5/- रुपये के स्थान पर 10638.85/- रुपये टंिकत हो गया, जो िक मात्र एक टंकण त्रुिट है. िजसे दुरुस्त िकया जाना न्यायिहत में है। इस संबंध में दण्ड प्रिक्रया की प्राজানা 362 में यह उिल्लिखत है िक न्यायालय का अपने िनणर्य में। में पिरवतर्न न करना इस संिहता या तत्समय प्रवृत्त िकसी अन्य िविध द्वारा जैसा उपबंिधत है, उसके िसवाय कोई न्यायालय जब उपने िकसी मामले को िनपटाने के िलये अपने िनणर्य या अंितम आदेश पर हस्ताक्षर कर िदये हैं िलिपकीय या गिणतीय भूल को ठीक करने के िसवाय उसमें कोई पिरवतर्न नहीं करेगा या उसका पुनिवलोकन नहीं करेगा। अतः मामले के समस्त तथ्यों एवं पिरिस्थितयों को दृिष्टगत रखते हुये धारा 362 दं०प्र०सं० के तहत पिरवाद उपरोक्त में इस न्यायालय द्वारा पािरत आदेश िदनांिकत 26.03.2025 के पैरा अंितम पैरा की चौथी पंिक्त में 10,638.85/ के स्थान पर 10,63,88.5/- का संशोधन िकया जाना न्यायिहत में आवश्यक है। आदेश पिरवादी रणिवजय िसह के द्वारा प्रस्तुत प्राथर्ना पत्र िदनांिकत 04.06.2025 स्वीकार िकया जाता है। धारा 362 दं०प्र०सं० के आलोक में न्यायालय द्वारा पािरत आदेश िदनांिकत 26.03.2025 में आदेश के अंितम पैरा में जहाँ '10,638.85/- अंिकत है के स्थान पर '10,63,88.5/- संशोिधत िकया जाये। पत्रावली वास्ते साक्ष्य पिरवादी िदनांक 27.08.2025 को पेश हो।

9. In the present case in hand, the Court finds that there has been no consideration of the parameter pertaining to the financial distress of the accused which is one of the consideration when a decision is to be taken for payment of interim compensation post evaluation on the merits on prima facie basis of the case of the complainant and the accused. The quantum of compensation has also not been taken note of and further the Court finds that there is no consideration with regard to the several factors such as nature of the transaction relationship between the accused and the complainant. Since the said exercise is completely lacking, thus this Court has no option but to set aside the order dated 26.3.2025 according to interim compensation to the opposite party no.2.

10. Accordingly, the present application stands disposed of.

11. The order dated 26.03.2025 passed by Additional Chief Judicial Magistrate/Additional Civil Judge, (SD), Court No. 3, Kanpur Dehat in Case No. 1734 of 2021 (Ranvijay Vs Ravi Kumar) under Section 138 Ν.Ι. Act Police Station: District: Kanpur Dehat is set aside.

12. The matter is remitted to back to the court below to pass fresh order with most expedition. 5 NA528 No. 37538 of 2025

13. In order to facilitate expeditious disposal of the matter, the applicant is to furnish the certified copy of the order by 10.10.2025.

14. The court below post remand shall pass a fresh order strictly in accordance with law principle laid down in the case of Rakesh Ranjan Srivastava (supra). September 25, 2025 piyush (Vikas Budhwar,J.)

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