Ambar Lal v. Rambaran), under Section
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Cited in this judgment
3. Petitioner has also challenged the order dated 25.07.2025 passed by the learned Additional District and Sessions Judge, Court NO. 1, Barabanki (in short 'Revisional Court') passed in Criminal Revision No. 07 of 2024 under Sections 397/399 CrPC. Relevant portion of the order dated 25.07.2025 reads as under:- "6. िवद्वान अवर न्यायालय उपिजला मिजस्ट्रेट रामसनेहीघाट, बाराबंकी द्वारा िनणर्य में िदये गये आधारो पर अपना िनणर्य इस प्रकार िनष्किषत िकया गया है िक- "पत्रावली पर पक्षों द्वारा अिभिलिखत कराये गये बयान मा० प्रवर न्यायालयों द्वारा पािरत िनणर्यादेशों की छाया प्रित थानाध्यक्ष दिरयाबाद द्वारा प्रस्तुत आख्या िदनांक 520.02.1994 व 22.02.1995 व नायब तहसीलदार द्वारा प्रस्तुत आख्या िदनांक 22.02.2018 सिहत सम्पूणर् पत्रावली का भली भांित अनुशीलन िकया गया। प्रथम पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य व िदये गये शपथपूवर्क बयान में िववािदत भूिम व उस पर लगे नीम के पेड़ को उनके पूवर्जो का होना तथा पूवर्जों की मृत्यु पश्चात अपना कब्जा व दखल होना कहा गया है। वहीं िद्वतीय पक्ष की ओर से पूवर् में अिभिलिखत कराये गये अपने शपथ पूवर्क बयान में प्रश्नगत भूिम व नीम के पेड़ को अपने पािरवािरक भूिम होना कहा गया है िजस पर मेरी चरही नांदे बनी है तथा छप्पर रखा जाता है। िववािदत भूिम पर लगे नीम के पेड़ के सम्बन्ध में कहा गया है िक वह मेरे दरवाजे पर लगा है। थानाध्य दिरयाबाद द्वारा प्रस्तुत आख्या िदनांक 20.02.1994 में इस बात का उल्लेख िकया गया है िक िववािदत जमीन िवपक्षी के मकान व सहन के दिक्षण है िजस पर िवपक्षी का ही कब्जा होना पाया गया है। िववािदत जमीन पर एक नीम का पेड़, चरही, मड़हा जानवरो का बना है। िजसपर िवपक्षी का ही कब्जा बताया गया है। आवेदक का कहना गलत है िक िववािदत जमीन पर िवपक्षी का कब्जा नहीं है जबिक सत्य यह है िक िवपक्षी पहले से ही उस जमीन पर कािबज है। पुनश्च थानाध्यक्ष दिरयाबाद द्वारा प्रस्तुत आख्या िदनांक 22.02.1995 में यह उल्लेख है िक िववािदत जमीन िजसका िववाद अम्बर लाल व रामबरन के मध्य चल रहा है। 3 A227 No. 6742 of 2025 िजसकी मौके जांच बाद पाया गया िक िववािदत भूिम पर 02 नांदे जो प्रचिलत है वह रामबरन की बनी हुई है इसके अितिरक्त कन्डे का ढेर भी रामबरन का लगा हुआ है। एक पेड़ भी नीम का मौजूद है िजसका िववाद उभय पक्षों के मध्य चल रहा है िजसको लेकर उभय पक्षो के मध्य िदनांक 02.10.1994 को मारपीट हो चुकी है। िजसका थाना स्थानीय पर उभय पक्षो के िवरूद्ध धारा 323, 504 का अिभयोग पंजीकृ त होकर आरोप पत्र न्यायालय पर प्रेिषत िकया गया है। वहीं थानाध्यक्ष दिरयाबाद द्वारा प्रस्तुत उक्त आख्या के िवरुद्ध प्रथम पक्ष द्वारा आपित्त प्रस्तुत करके यह कथन िदया गया है पुिलस द्वारा प्रस्तुत आख्या मनगढ़न्त सािजश व िवपक्षी को िववािदत भूिम व उस पर लगे नीम के पेड़ पर कब्जा कराने के िलए प्रस्तुत की गई है। थाना दिरयाबाद की पुिलस व िवपक्षीगण की िमली भगत है। नायब तहसीलदार द्वारा प्रस्तुत आख्या िदनांक 22.02.2018 में उल्लेख है िक प्रकरण श्रेणी 6(2) के पुरानी आबादी के अन्दर का है। िवपक्षीगण द्वारा िदनांक 10 फरवरी 2018 को दीवार का िनमार्ण कर टीन सेट रख िलया गया है। स्थानीय पुिलस द्वारा दोनों पक्षो के मध्य आपसी समझौता कराया गया िक िववािदत स्थल पर िबना िकसी सक्षम न्यायालय के आदेश के कोई नया िनमार्ण न िकया जाय। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है िक िववािदत भूिम व उस पर लगा नीम का पेड़ आबादी के अन्दर िस्थत है। िजसके स्वािमत्व को लेकर उभय पक्षों के मध्य िववाद है। न्यायालय पर दं०प्र०सं० धारा-145 के तहत प्रचिलत कायर्वाही के तहत आबादी की भूिम व उस पर लगे नीम का पेड का स्वािमत्व का िनधार्रण िकया जाना िविधक नहीं प्रतीत होता है। उभय पक्ष स्वािमत्व का िनधार्रण सक्षम न्यायालय में वाद योिजत कर करा सकते हैं, चू ंिक यह प्रकरण अत्यिधक समय से लिम्बत है अब अग्रेतर कायर्वाही का औिचत्य नहीं प्रतीत होता है। अतः धारा-145 दं०प्र०सं० के तहत प्रचिलत कायर्वाही समाप्त िकये जाने योग्य है। आदेश न्यायालय पर प्रचिलत वाद अन्तगर्त धारा-145 दं०प्र०सं० की कायर्वाही समाप्त की जाती है। आदेश की प्रित प्रभारी िनरीक्षक दिरयाबाद को इस िनदेर्श के साथ प्रेिषत की जाती है िक िववािदत स्थल पर शािन्त व्यवस्था बनाये रखने हेतु िनरंतर सतकर् दृिष्ट बनाये रखें। बाद आवश्यक कायर्वाही दािखल दफ्तर की जाय। उपिजला मिजस्ट्रेट रामसनेहीघाट, बाराबंकी। "
7. उक्त आक्षेिपत िनणर्य िदनांिकत 17.10.2023 के अवलोकन से यह स्पष्ट है िक उक्त िनणर्य िनगरानीकतार् / प्राथीर् अम्बरलाल वमार् के प्राथर्नापत्र िदनांिकत 18.10.1993 एवं उसपर िवपक्षी की ओर से प्रस्तुत आपित्त िदनांक 04.07.1994 पर पािरत िकया गया है। इस प्रकार स्पष्ट है िक आक्षेिपत िनणर्य एवं आदेश प्राथर्नापत्र प्रस्तुत िकये जाने के लगभग 30 वषर् पश्चात पािरत िकया गया है एवं उक्त आदेश के जिरये अवर न्यायालय पर प्रचिलत वाद अन्तगर्त धारा 145 दं०प्र०सं० की कायर्वाही समाप्त की गयी है। इस प्रकार स्पष्ट है िक उक्त प्राथर्नापत्र पर पािरत आदेश के जिरये लगभग 30 वषर् तक शािन्त व्यवस्था भंग होने की आशंका बनी रही। इस संदभर् में िनणर्य के अवलोकन से ही स्पष्ट है िक उभय पक्ष के मध्य िववािदत पेड़ व भूिम से संबंिधत मुकदमे आपरािधक न्यायालय एवं चकबंदी न्यायालय, साथ ही साथ उक्त पेड़ को लेकर दीवानी न्यायालय में भी अम्बरलाल द्वारा वाद दायर करना कहा गया है।
8. प्रस्तुत मामले में यह उल्लेखनीय है, जैसा िक िवपक्षी के िवद्वान अिधवक्ता द्वारा तकर् भी प्रस्तुत करते हुये कहा गया है, िक प्रश्नगत सम्पित्त के संदभर् में ही िनगरानीकतार् / प्राथीर् अम्बर लाल द्वारा एक िनगरानी िदनांक 21.10.1996 को एवं दूसरी िनगरानी िदनांक 23.02.1999 को दािखल की गयी थी, िजसे िक संबंिधत सत्र न्यायालय द्वारा िदनांक 20.03.2013 व 13.11.2003 को िनरस्त िकया गया। अवर न्यायालय की पत्रावली के अवलोकन से सबंिधत सत्र न्यायालय द्वारा, आपरािधक िनगरानी संख्या 105/2003, अम्बर लाल वमार् बनाम रामबरन आिद के मामले में वाद संख्या 01/1999 धारा 145 दं०प्र०सं० में पािरत आदेश िदनांिकत 20.02.2003 के संदभर् में, िनगरानीकतार् अम्बरलाल वमार् द्वारा योिजत िनगरानी िदनांक 13.11.2003 को िनरस्त की गयी। उक्त िनगरानी में भी नीम के पेड़ व जानवरो के चारा के िलये लगी नांद से संबंिधत भूिम का ही िववाद था। इस प्रकार स्पष्ट है िक हस्तगत िनगरानी से संबंिधत वाद एवं दो अन्य िनगरािनयों से संबंिधत वाद के आधार पर प्राथीर् शािन्त भंग होने की संभावना के आधार पर लगातार िविभन्न वाद अन्तगर्त धारा 145 द०प्र०सं०, 30 वषोर्ं के दौरान प्रस्तुत करता रहा, जबिक वादी द्वारा अपने प्राथर्नापत्र में प्रश्नगत नीम का पेड़ एवं संबंिधत भूिम को स्वयं के पुरखो द्वारा प्राप्त िकया जाना कहा गया है। अतः उक्त 30 वषोर्ं की अविध के दौरान िनगरानीकतार् / प्राथीर् अम्बरलाल वमार् को यह प्रत्येक अवसर प्राप्त था िक वह प्रश्नगत सम्पित्तयों के सन्दभर् में अपने स्वत्व व अिधकार को सािबत करने अथवा उसकी उद्घोषणा के संदभर् में िविध अनुसार 'िसिवल सूट' िसिवल न्यायालय में प्रस्तुत करके प्रश्नगत सम्पित्त में किथत अपने स्वत्व व कब्जे को िनणीर्त करा लेवे, िकन्तु िनगरानीकतार् / प्राथीर् द्वारा इस िनगरानी न्यायालय के समक्ष ऐसे िकसी िसिवल वाद के जिरये स्वत्व व कब्जे के बाबत अंितम अनुतोष प्राप्त करने के संबंध में, संज्ञान में नहीं लाया गया है। हालांिक िवद्वान िवचारण न्यायालय द्वारा अपने िनणर्य में इस बात का उल्लेख अवश्य िकया गया है िक, प्रश्नगत सम्पित्त के संदभर् में िनगरानीकतार् / प्राथीर् अम्बर लाल द्वारा एक दीवानी वाद भी दािखल िकया गया था। 4 A227 No. 6742 of 2025 अतः दीवानी न्यायालय ही वह न्यायालय है जो िनगरानीकतार् / प्राथीर् अम्बरलाल द्वारा किथत प्रश्नगत नीम के पेड़ व उक्त भूिम के बाबत उसके स्वत्व व कब्जे को िनणीर्त कर इस िववाद को अंितम रूप दे सके ।
9.1 इस प्रकार उक्त समस्त साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है िक िनगरानीकतार् / प्राथीर् अम्बर लाल धारा 145 दं०प्र०सं० की िविभन्न प्राथर्नापत्रों के जिरये प्रस्तुत मामले में शािन्त भग की आशंका के आधार पर धारा 145 दं०प्र०सं० के िविभन्न प्राथर्नापत्र प्रस्तुत करके मामले के मूल िववाद को अनावश्यक रूप से लंिबत रखना चाहता है, जबिक उसके पास 30 वषोर्ं की लम्बी अविध में यह प्रत्येक अवसर प्राप्त था िक वह प्रश्नगत सम्पित्त के संदभर् में अपने स्वािमत्व व कब्जे को िसिवल वाद के जिरये िनणीर्त करा सके ।
9.2 यहां यह उल्लेख िकया जाना भी समीचीन होगा िक, धारा 145 दं०प्र०सं० के तहत की जाने वाली कायर्वाही एक 'िनवारक उपचार' है ना िक िसिवल वाद के िनणर्य की भांित 'िनणार्यक उपचार' धारा 145 दं०प्र०सं० के अन्तगर्त कायर्वाही एक फौरी तौर पर िनवारात्मक कायर्वाही है, िजससे िकसी सम्पित्त के िववाद को लेकर शािन्त भग की आशंका को िनवािरत िकया जा सके । प्रस्तुत मामले में लगातार 30 वषोर्ं तक शािन्त भंग की आशंका स्वयं में एक ऐसी पिरिस्थित है, जो उभय पक्ष के मध्य अनवरत शािन्तभंग को िवद्यमान रखेगी, यह ना तो धारा 145 दं०प्र०सं० के िविधक उपबंधो की मंशा है और ना ही िवधाियका की मंशा है िक धारा 145 दं०प्र०सं० की लगातार कायर्वािहयों के जिरये एक पक्ष दूसरे पक्ष को शािन्त भंग के िलए प्रकोिपत करता रहे; जबिक प्रथम पक्ष द्वारा स्वयं को प्रश्नगत भूिम का स्वामी एवं कब्जाधारी 30 वषोर्ं से कहा जा रहा हो एवं इस संदभर् में उसके द्वारा अंितम उपचारात्मक अनुतोष, जोिक िसिवल न्यायालय से प्राप्त िकया जा सकता है, वह ना प्राप्त िकया जा रहा हो।
9.3 अतः ऐसी िस्थित में प्राथीर् द्वारा प्रश्नगत सम्पित्त जोिक आबादी के अन्दर िस्थत नीम का पेड़ एवं आबादी की भूिम है, िजसके िक संदभर् में थानाध्यक्ष दिरयाबाद द्वारा यह आख्या िदनांिकत 20.02.1994 को प्रस्तुत की गयी है िक "िववािदत जमीन िवपक्षी के मकान व सहन के दिक्षण है िजसपर िवपक्षी का ही कब्जा होना पाया गया। िववािदत जमीन पर एक नीम का पेड़, चरही, मड़हा, जानवरों का बना है िजसपर िवपक्षी का ही कब्जा बताया गया है। आवेदक का कहना गलत है िक िववािदत जमीन पर िवपक्षी का कब्जा नहीं है जबिक सत्य यह है िक िवपक्षी पहले से ही उस जमीन पर कािबज है।" पुनश्च थानाध्यक्ष दिरयाबाद द्वारा प्रस्तुत आख्या िदनांक 22.02.1995 में यह उल्लेख है िक, "िववािदत जमीन िजसका िववाद अम्बर लाल व रामबरन के मध्य चल रहा है, िजसकी मौके पर जांच बाद पाया गया िक िववािदत भूिम पर 02 नांदे जो प्रचिलत है वह रामबरन की बनी हुई है इसके अितिरक्त कन्डे का ढेर भी रामबरन का लगा हुआ है। एक पेड़ भी नीम का मौजूद है िजसका िववाद उभय पक्षों के मध्य चल रहा है िजसको लेकर उभय पक्षो के मध्य िदनांक 02.10.1994 को मारपीट हो चुकी है। िजसका थाना स्थानीय पर उभय पक्षो के िवरूद्ध धारा 323, 504 का अिभयोग पंजीकृ त होकर आरोप पत्र न्यायालय पर प्रेिषत िकया गया है।"
9.4 प्रस्तुत मामले में प्रथम पक्ष अम्बर लाल ने िवचारण न्यायालय के समक्ष अपने सशपथ बयान में यह भी कहा गया है िक "जो दीवानी न्यायालय का मुकदमा चल रहे है, वह उसमें प्रथम पक्ष है।"
10.1 प्रस्तुत िनगरानी के संदभर् में अमरेश ितवारी बनाम लालता प्रसाद दूबे (2000) 4 एससीसी 440 के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय की 3 न्यायमूतीर्गण की पीठ द्वारा पािरत िविध व्यवस्था को दृिष्टगत रखना होगा,िजसमें Ram Sumer Puri Mahant V. State of U.P. and others (1985) 1 SCC 427 के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पूवर् में दी गयी िविध व्यवस्था का हवाला देते हुये यह व्यवस्था दी गयी है िक, 'जहां सक्षम दीवानी न्यायालय में वादग्रस्त सम्पित्त के कब्जे अथवा उसके स्वत्व की उद्घोषणा के संदभर् में वाद दायर िकया जा चुका हो, तो ऐसी िस्थित में धारा 145 दं०प्र०सं० के अन्तगर्त कायर्वाही अग्रसािरत नहीं होना चािहये,' िकन्तु िनगरानीकतार् की ओर से माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा, प्रकाशचन्द्र सचदेव बनाम स्टेट आिद एआईआर 1994 सुप्रीमकोटर् 1436 के मामले में दी गयी िविध व्यवस्था प्रस्तुत की गयी, िजसमें माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा यह भी व्यवस्था दी गयी है िक 'जहां िसिवल न्यायालय द्वारा िदये गये यथािस्थित का आदेश उभय पक्ष के मध्य शािन्त व्यवस्था बनाये रखने हेतु पयार्प्त नहीं है, अथवा जहां िसिवल न्यायालय द्वारा कब्जे के िबन्दु को समुिचत रूप से व्यवहृत नहीं िकया गया है, वहां धारा 145 दं०प्र०सं० के अन्तगर्त संबंिधत मिजस्ट्रेट को कायर्वाही करने का अिधकार प्राप्त है।' इसी िबन्दु पर िनगरानीकतार् की ओर से माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद की अद्यतन व्यवस्था IRFAN ALI V. STATE OF U.P. and others [2024(127)ACC596] का भी हवाला िदया गया है, िजसमें यह व्यवस्था दी गयी है िक, 'जहां िसिवल न्यायालय द्वारा कोई अंतिरम आदेश पािरत नहीं िकया गया हो अथवा के वल यथािस्थित बनाये रखने का आदेश पािरत िकया गया हो, वहां धारा 145 दं०प्र०सं० के अन्तगर्त कायर्वाही अग्रसािरत की जा सकती है।'
10.2 िनगरानीकतार् की ओर से माननीय उच्च न्यायालय, इलाहाबाद की एक अन्य व्यवस्था, Bharwal Prasad Vs. IlAddl.District and Session Judge Sihdharthnagar, RR 1985 Page 55 प्रस्तुत की गयी है। उक्त िनणर्य में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा यह व्यवस्था दी गयी है िक 'धारा 145 (1) दं०प्र०सं० के मामले में पुिलस िरपोटर् का उद्देश्य यह है िक क्या प्रस्तुत मामले में शािन्त भंग होने की संभावना िवद्यमान है। यह पुिलस िरपोटर् िकसी व्यिक्त के कब्जे की जांच के संदभर् में नहीं होती क्योंिक इस हेतु पक्षकार को अपने साक्ष्य के जिरये अपने कब्जे को सािबत करना होता है। मेरे द्वारा माननीय उच्च न्यायालय की उक्त िविध व्यवस्था का भी सम्मानपूवर्क अवलोकन िकया। 5 A227 No. 6742 of 2025
10.3 िनगरानीकतार् की ओर से माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद की खंडपीठ की व्यवस्था, SATYA NARAIN V. STATE OF U.P.(ALLAHABAD HIGHCOURT) 1997 (35) इस िबन्दु पर प्रस्तुत की गयी है िक 'यिद संबंिधत अधीनस्थ न्यायालय द्वारा धारा 145 (6) दं०प्र०सं० के अन्तगर्त िदया गया अिभमत िवसंगित एवं मूल र्ल्यांिकत कर सकती है।' रूप से त्रुिटपूणर् या िकसी िविधक नुक्स से ग्रिसत हो, तो िनगरानी न्यायालय साक्ष्य को पुनमू मेरे द्वारा माननीय उच्च न्यायालय की उक्त िविध व्यवस्था का भी सम्मानपूवर्क अवलोकन िकया।
10.4 िनगरानीकतार् की ओर से माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद (लखनऊ खंडपीठ) की एक अन्य व्यवस्था, RAJENDRA PRATAP SINGH V. DISTRICT AND SESSIONS JUDGE GONDA AND OTHERS 1994 Page 398 इस िबन्दु पर प्रस्तुत की गयी है िक, 'धारा 145 दं०प्र०सं० की कायर्वाही एक तरफा पुिलस िरपोटर् पर िक, 'शािन्त भंग की आशंका नहीं है, के आधार पर समाप्त नहीं की जा सकती। मेरे द्वारा माननीय उच्च न्यायालय की उक्त िविध व्यवस्था का भी सम्मानपूवर्क अवलोकन िकया।
10.5 िनगरानीकतार् की ओर से माननीय उच्च न्यायालय उड़ीसा की व्यवस्था, Sanat Kumar Patnaik V. Binoy Kumar Nayak and another, 1999 CRI.L.J.351 इस िबन्दु पर प्रस्तुत की गयी िक, 'यिद एक बार िनगरानी ग्राह्य हो जाती है तब वह गुण दोष पर ही िनणीर्त होगी, बल ना िदये जाने के आधार पर िनणीर्त नहीं हो सकती। मेरे द्वारा माननीय उच्च न्यायालय की उक्त िविध व्यवस्था का भी सम्मानपूवर्क अवलोकन िकया गया।
11.1 प्रश्नगत आक्षेिपत आदेश मुख्य रूप से दो िबन्दुओं पर पािरत िकया गया है, प्रथम यह िक, िवचारण न्यायालय द्वारा प्रश्नगत भूिम पर प्रथम दृष्टया िवपक्षी का कब्जा पाया गया है, िद्वतीय यह िक, प्रश्नगत भूिम आबादी की होने एवं भूिम तथा उसमें लगे पेड़ के स्वािमत्व का मूल िववाद होने के कारण धारा 145 दं०प्र०सं० के अन्तगर्त उक्त भूिम व नीम के पेड़ पर उभय पक्ष के स्वािमत्व का िनधार्रण सक्षम िसिवल न्यायालय द्वारा ही िकया जा सकने, के आधार पर धारा 145 दं०प्र०सं० की कायर्वाही को समाप्त की गयी है।
11.2 उक्त आक्षेिपत िनणर्य से यह स्पष्ट है िक उभय पक्ष के मध्य लगभग 30 वषोर्ं से अिधक समय से चकबंदी न्यायालय एवं आपरािधक न्यायालय तथा िसिवल न्यायालय में िविभन्न वाद चल रहे हैं। यिद िनगरानीकतार् का प्रश्नगत भूिम एवं नीम के पेड़ पर स्वािमत्व एवं कब्जा था, तो उसके पास वह प्रत्येक अवसर था, िक वह इस 30 वषर् के दौरान िसिवल न्यायालय से प्रश्नगत भूिम पर अपने स्वािमत्व एवं कब्जे की उद्घोषणा के संदभर् में अनुतोष प्राप्त कर िववाद को सदैव के िलये समाप्त करा लेवे, िकन्तु वह लगातार धारा 145 दं०प्र०सं० की कायर्वाही लगभग 30 वषोर्ं से अग्रसािरत िकये हुये है, िजसमें िक, उसके द्वारा पूवर् में 145 दं०प्र०सं० के दो प्राथर्नापत्र, िजनका िक ऊपर उल्लेख िकया गया है, वह इसी सम्पित्त के संदभर् में थे, िनरस्त िकये जा चुके हैं एवं उनकी िनगरानी भी सत्र न्यायालय द्वारा िनरस्त िकया जाना बताया गया है। अतः इस प्रकार स्पष्ट होता है िक िनगरानीकतार्/प्राथीर् धारा 145 दं०प्र०सं० के अन्तगर्त दी गयी िविधक प्रिक्रया का दुरूपयोग करते हुये एवं प्रश्नगत भूिम के स्वत्व एवं कब्जे के प्रश्न को अनुत्तिरत रखे जाने के आशय से, प्रश्नगत सम्पित्त के संदभर् में शािन्त व्यवस्था भंग होने के आधार पर धारा 145 दं०प्र०सं० की कायर्वाही कर उक्त िववाद को अिनिश्चतकाल के िलये लंिबत रखना चाहता है, जोिक ना तो धारा 145 दं०प्र०सं० की मंशा है और ना ही यह न्याय की मंशा है िक वह िकसी व्यिक्त को यह छू ट प्रदान करें िक वह समुिचत िविधक प्रिक्रया को ना अपनाते हुये िकसी अन्य िविधक प्रिक्रया का दुरूपयोग कर, ना के वल िकसी सम्पित्त के िववाद को अिनिश्चतकाल तक लंिबत रखे वरन अपने उक्त आचरण के द्वारा वह दूसरे पक्ष को शािन्त व्यवस्था भंग करने के िलये प्रकोिपत करे। अस्तु उक्त तथ्यों एवं पिरिस्थितयों में िनगरानीकतार् अपने द्वारा प्रस्तुत माननीय उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय की उक्त िविध व्यवस्थाओं का लाभ अपने पक्ष में पाने का अिधकारी नहीं है।
11.3 अस्तु उक्त तथ्यों एवं पिरिस्थितयों एवं साक्ष्यों के िववेचन के पश्चात् माननीय उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय की उक्त िविध व्यवस्थाओं के आलोक में यह न्यायालय इस िनष्कषर् की है िक, िवद्वान िवचारण न्यायालय द्वारा उक्त आक्षेिपत आदेश पािरत करने में कोई िविधक त्रुिट या कोई अिनयिमतता नहीं की गयी है, िजससे िक िनगरानी में िदये गये िकसी भी आधार पर आलोच्य आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई औिचत्य हो, पिरणामतः िवद्वान अवर न्यायालय द्वारा पािरत आक्षेिपत िनणर्य व आदेश िदनांिकत 17.10.2023 पुष्ट िकये जाने योग्य है। फलस्वरूप िनगरानीकतार् की प्रस्तुत िनगरानी बलहीन होने के कारण िनरस्त िकये जाने योग्य है। आदेश तदनुसार िनगरानीकतार् की प्रस्तुत िनगरानी संख्या 07/2024 िनरस्त की जाती है। पिरणामस्वरुप अवर न्यायालय के द्वारा पािरत उक्त आक्षेिपत िनणर्य एवं आदेश िदनॉिकत 17.10.2023 पुष्ट िकया जाता है। िनणर्य की एक प्रित मय अवर न्यायालय की पत्रावली अिवलम्ब प्रेिषत की जाये। बाद आवश्यक कायर्वाही पत्रावली अिभलेखागार संग्रिहत हो। िलिपक िनयमानुसार आवश्यक कायर्वाही सुिनिश्चत करें।"
4. Considered the aforesaid as also the submissions advanced by the learned counsel for the parties, material available on record and also the report(s) 6 A227 No. 6742 of 2025 dated 20.02.1994 submitted by the SHO, Dariyabad, Barabanki and 22.02.1995 submitted by Nayab Tehsildar, Dariyabad, Barabanki and also various pronouncements on the issue related to Section 125 CrPC.
5. Upon due consideration of aforesaid, this Court is of the view that no interference is required in the matter. It is for the following reason(s):- (i) The report dated 20.02.1994 on record indicates that on the disputed land side opposite was in possession. (ii) Subsequent report dated 22.02.1995 also indicates that side opposite was in possession. (iii) The report of the Nayab Tehsildar, Dariyabad, Barabanki dated
22.02.2018 indicates that the dispute between the parties relates to a peace of land and there is apprehension of breach of peace. (iv) The private opposite parties are blood relatives of the petitioner who initiated the proceedings in terms of Section 125 CrPC. (v) The aforesaid indicates that at the time of initiation of proceedings under Section 125 CrPC the private opposite parties were in possession of the property in issue. (vi) It is not the case of the petitioner that he was wrongfully dispossessed within two months next before the date of initiation of proceedings under Section 145 CrPC.
6. For the reasons aforesaid, the petition is liable to be dismissed. It is accordingly dismissed. November 20, 2025 Vinay/- (Saurabh Lavania,J.)
3. Petitioner has also challenged the order dated 25.07.2025 passed by the learned Additional District and Sessions Judge, Court NO. 1, Barabanki (in short 'Revisional Court') passed in Criminal Revision No. 07 of 2024 under Sections 397/399 CrPC. Relevant portion of the order dated 25.07.2025 reads as under:- "6. िवद्वान अवर न्यायालय उपिजला मिजस्ट्रेट रामसनेहीघाट, बाराबंकी द्वारा िनणर्य में िदये गये आधारो पर अपना िनणर्य इस प्रकार िनष्किषत िकया गया है िक- "पत्रावली पर पक्षों द्वारा अिभिलिखत कराये गये बयान मा० प्रवर न्यायालयों द्वारा पािरत िनणर्यादेशों की छाया प्रित थानाध्यक्ष दिरयाबाद द्वारा प्रस्तुत आख्या िदनांक 520.02.1994 व 22.02.1995 व नायब तहसीलदार द्वारा प्रस्तुत आख्या िदनांक 22.02.2018 सिहत सम्पूणर् पत्रावली का भली भांित अनुशीलन िकया गया। प्रथम पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य व िदये गये शपथपूवर्क बयान में िववािदत भूिम व उस पर लगे नीम के पेड़ को उनके पूवर्जो का होना तथा पूवर्जों की मृत्यु पश्चात अपना कब्जा व दखल होना कहा गया है। वहीं िद्वतीय पक्ष की ओर से पूवर् में अिभिलिखत कराये गये अपने शपथ पूवर्क बयान में प्रश्नगत भूिम व नीम के पेड़ को अपने पािरवािरक भूिम होना कहा गया है िजस पर मेरी चरही नांदे बनी है तथा छप्पर रखा जाता है। िववािदत भूिम पर लगे नीम के पेड़ के सम्बन्ध में कहा गया है िक वह मेरे दरवाजे पर लगा है। थानाध्य दिरयाबाद द्वारा प्रस्तुत आख्या िदनांक 20.02.1994 में इस बात का उल्लेख िकया गया है िक िववािदत जमीन िवपक्षी के मकान व सहन के दिक्षण है िजस पर िवपक्षी का ही कब्जा होना पाया गया है। िववािदत जमीन पर एक नीम का पेड़, चरही, मड़हा जानवरो का बना है। िजसपर िवपक्षी का ही कब्जा बताया गया है। आवेदक का कहना गलत है िक िववािदत जमीन पर िवपक्षी का कब्जा नहीं है जबिक सत्य यह है िक िवपक्षी पहले से ही उस जमीन पर कािबज है। पुनश्च थानाध्यक्ष दिरयाबाद द्वारा प्रस्तुत आख्या िदनांक 22.02.1995 में यह उल्लेख है िक िववािदत जमीन िजसका िववाद अम्बर लाल व रामबरन के मध्य चल रहा है। 3 A227 No. 6742 of 2025 िजसकी मौके जांच बाद पाया गया िक िववािदत भूिम पर 02 नांदे जो प्रचिलत है वह रामबरन की बनी हुई है इसके अितिरक्त कन्डे का ढेर भी रामबरन का लगा हुआ है। एक पेड़ भी नीम का मौजूद है िजसका िववाद उभय पक्षों के मध्य चल रहा है िजसको लेकर उभय पक्षो के मध्य िदनांक 02.10.1994 को मारपीट हो चुकी है। िजसका थाना स्थानीय पर उभय पक्षो के िवरूद्ध धारा 323, 504 का अिभयोग पंजीकृ त होकर आरोप पत्र न्यायालय पर प्रेिषत िकया गया है। वहीं थानाध्यक्ष दिरयाबाद द्वारा प्रस्तुत उक्त आख्या के िवरुद्ध प्रथम पक्ष द्वारा आपित्त प्रस्तुत करके यह कथन िदया गया है पुिलस द्वारा प्रस्तुत आख्या मनगढ़न्त सािजश व िवपक्षी को िववािदत भूिम व उस पर लगे नीम के पेड़ पर कब्जा कराने के िलए प्रस्तुत की गई है। थाना दिरयाबाद की पुिलस व िवपक्षीगण की िमली भगत है। नायब तहसीलदार द्वारा प्रस्तुत आख्या िदनांक 22.02.2018 में उल्लेख है िक प्रकरण श्रेणी 6(2) के पुरानी आबादी के अन्दर का है। िवपक्षीगण द्वारा िदनांक 10 फरवरी 2018 को दीवार का िनमार्ण कर टीन सेट रख िलया गया है। स्थानीय पुिलस द्वारा दोनों पक्षो के मध्य आपसी समझौता कराया गया िक िववािदत स्थल पर िबना िकसी सक्षम न्यायालय के आदेश के कोई नया िनमार्ण न िकया जाय। उपरोक्त तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है िक िववािदत भूिम व उस पर लगा नीम का पेड़ आबादी के अन्दर िस्थत है। िजसके स्वािमत्व को लेकर उभय पक्षों के मध्य िववाद है। न्यायालय पर दं०प्र०सं० धारा-145 के तहत प्रचिलत कायर्वाही के तहत आबादी की भूिम व उस पर लगे नीम का पेड का स्वािमत्व का िनधार्रण िकया जाना िविधक नहीं प्रतीत होता है। उभय पक्ष स्वािमत्व का िनधार्रण सक्षम न्यायालय में वाद योिजत कर करा सकते हैं, चू ंिक यह प्रकरण अत्यिधक समय से लिम्बत है अब अग्रेतर कायर्वाही का औिचत्य नहीं प्रतीत होता है। अतः धारा-145 दं०प्र०सं० के तहत प्रचिलत कायर्वाही समाप्त िकये जाने योग्य है। आदेश न्यायालय पर प्रचिलत वाद अन्तगर्त धारा-145 दं०प्र०सं० की कायर्वाही समाप्त की जाती है। आदेश की प्रित प्रभारी िनरीक्षक दिरयाबाद को इस िनदेर्श के साथ प्रेिषत की जाती है िक िववािदत स्थल पर शािन्त व्यवस्था बनाये रखने हेतु िनरंतर सतकर् दृिष्ट बनाये रखें। बाद आवश्यक कायर्वाही दािखल दफ्तर की जाय। उपिजला मिजस्ट्रेट रामसनेहीघाट, बाराबंकी। "
7. उक्त आक्षेिपत िनणर्य िदनांिकत 17.10.2023 के अवलोकन से यह स्पष्ट है िक उक्त िनणर्य िनगरानीकतार् / प्राथीर् अम्बरलाल वमार् के प्राथर्नापत्र िदनांिकत 18.10.1993 एवं उसपर िवपक्षी की ओर से प्रस्तुत आपित्त िदनांक 04.07.1994 पर पािरत िकया गया है। इस प्रकार स्पष्ट है िक आक्षेिपत िनणर्य एवं आदेश प्राथर्नापत्र प्रस्तुत िकये जाने के लगभग 30 वषर् पश्चात पािरत िकया गया है एवं उक्त आदेश के जिरये अवर न्यायालय पर प्रचिलत वाद अन्तगर्त धारा 145 दं०प्र०सं० की कायर्वाही समाप्त की गयी है। इस प्रकार स्पष्ट है िक उक्त प्राथर्नापत्र पर पािरत आदेश के जिरये लगभग 30 वषर् तक शािन्त व्यवस्था भंग होने की आशंका बनी रही। इस संदभर् में िनणर्य के अवलोकन से ही स्पष्ट है िक उभय पक्ष के मध्य िववािदत पेड़ व भूिम से संबंिधत मुकदमे आपरािधक न्यायालय एवं चकबंदी न्यायालय, साथ ही साथ उक्त पेड़ को लेकर दीवानी न्यायालय में भी अम्बरलाल द्वारा वाद दायर करना कहा गया है।
8. प्रस्तुत मामले में यह उल्लेखनीय है, जैसा िक िवपक्षी के िवद्वान अिधवक्ता द्वारा तकर् भी प्रस्तुत करते हुये कहा गया है, िक प्रश्नगत सम्पित्त के संदभर् में ही िनगरानीकतार् / प्राथीर् अम्बर लाल द्वारा एक िनगरानी िदनांक 21.10.1996 को एवं दूसरी िनगरानी िदनांक 23.02.1999 को दािखल की गयी थी, िजसे िक संबंिधत सत्र न्यायालय द्वारा िदनांक 20.03.2013 व 13.11.2003 को िनरस्त िकया गया। अवर न्यायालय की पत्रावली के अवलोकन से सबंिधत सत्र न्यायालय द्वारा, आपरािधक िनगरानी संख्या 105/2003, अम्बर लाल वमार् बनाम रामबरन आिद के मामले में वाद संख्या 01/1999 धारा 145 दं०प्र०सं० में पािरत आदेश िदनांिकत 20.02.2003 के संदभर् में, िनगरानीकतार् अम्बरलाल वमार् द्वारा योिजत िनगरानी िदनांक 13.11.2003 को िनरस्त की गयी। उक्त िनगरानी में भी नीम के पेड़ व जानवरो के चारा के िलये लगी नांद से संबंिधत भूिम का ही िववाद था। इस प्रकार स्पष्ट है िक हस्तगत िनगरानी से संबंिधत वाद एवं दो अन्य िनगरािनयों से संबंिधत वाद के आधार पर प्राथीर् शािन्त भंग होने की संभावना के आधार पर लगातार िविभन्न वाद अन्तगर्त धारा 145 द०प्र०सं०, 30 वषोर्ं के दौरान प्रस्तुत करता रहा, जबिक वादी द्वारा अपने प्राथर्नापत्र में प्रश्नगत नीम का पेड़ एवं संबंिधत भूिम को स्वयं के पुरखो द्वारा प्राप्त िकया जाना कहा गया है। अतः उक्त 30 वषोर्ं की अविध के दौरान िनगरानीकतार् / प्राथीर् अम्बरलाल वमार् को यह प्रत्येक अवसर प्राप्त था िक वह प्रश्नगत सम्पित्तयों के सन्दभर् में अपने स्वत्व व अिधकार को सािबत करने अथवा उसकी उद्घोषणा के संदभर् में िविध अनुसार 'िसिवल सूट' िसिवल न्यायालय में प्रस्तुत करके प्रश्नगत सम्पित्त में किथत अपने स्वत्व व कब्जे को िनणीर्त करा लेवे, िकन्तु िनगरानीकतार् / प्राथीर् द्वारा इस िनगरानी न्यायालय के समक्ष ऐसे िकसी िसिवल वाद के जिरये स्वत्व व कब्जे के बाबत अंितम अनुतोष प्राप्त करने के संबंध में, संज्ञान में नहीं लाया गया है। हालांिक िवद्वान िवचारण न्यायालय द्वारा अपने िनणर्य में इस बात का उल्लेख अवश्य िकया गया है िक, प्रश्नगत सम्पित्त के संदभर् में िनगरानीकतार् / प्राथीर् अम्बर लाल द्वारा एक दीवानी वाद भी दािखल िकया गया था। 4 A227 No. 6742 of 2025 अतः दीवानी न्यायालय ही वह न्यायालय है जो िनगरानीकतार् / प्राथीर् अम्बरलाल द्वारा किथत प्रश्नगत नीम के पेड़ व उक्त भूिम के बाबत उसके स्वत्व व कब्जे को िनणीर्त कर इस िववाद को अंितम रूप दे सके ।
9.1 इस प्रकार उक्त समस्त साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है िक िनगरानीकतार् / प्राथीर् अम्बर लाल धारा 145 दं०प्र०सं० की िविभन्न प्राथर्नापत्रों के जिरये प्रस्तुत मामले में शािन्त भग की आशंका के आधार पर धारा 145 दं०प्र०सं० के िविभन्न प्राथर्नापत्र प्रस्तुत करके मामले के मूल िववाद को अनावश्यक रूप से लंिबत रखना चाहता है, जबिक उसके पास 30 वषोर्ं की लम्बी अविध में यह प्रत्येक अवसर प्राप्त था िक वह प्रश्नगत सम्पित्त के संदभर् में अपने स्वािमत्व व कब्जे को िसिवल वाद के जिरये िनणीर्त करा सके ।
9.2 यहां यह उल्लेख िकया जाना भी समीचीन होगा िक, धारा 145 दं०प्र०सं० के तहत की जाने वाली कायर्वाही एक 'िनवारक उपचार' है ना िक िसिवल वाद के िनणर्य की भांित 'िनणार्यक उपचार' धारा 145 दं०प्र०सं० के अन्तगर्त कायर्वाही एक फौरी तौर पर िनवारात्मक कायर्वाही है, िजससे िकसी सम्पित्त के िववाद को लेकर शािन्त भग की आशंका को िनवािरत िकया जा सके । प्रस्तुत मामले में लगातार 30 वषोर्ं तक शािन्त भंग की आशंका स्वयं में एक ऐसी पिरिस्थित है, जो उभय पक्ष के मध्य अनवरत शािन्तभंग को िवद्यमान रखेगी, यह ना तो धारा 145 दं०प्र०सं० के िविधक उपबंधो की मंशा है और ना ही िवधाियका की मंशा है िक धारा 145 दं०प्र०सं० की लगातार कायर्वािहयों के जिरये एक पक्ष दूसरे पक्ष को शािन्त भंग के िलए प्रकोिपत करता रहे; जबिक प्रथम पक्ष द्वारा स्वयं को प्रश्नगत भूिम का स्वामी एवं कब्जाधारी 30 वषोर्ं से कहा जा रहा हो एवं इस संदभर् में उसके द्वारा अंितम उपचारात्मक अनुतोष, जोिक िसिवल न्यायालय से प्राप्त िकया जा सकता है, वह ना प्राप्त िकया जा रहा हो।
9.3 अतः ऐसी िस्थित में प्राथीर् द्वारा प्रश्नगत सम्पित्त जोिक आबादी के अन्दर िस्थत नीम का पेड़ एवं आबादी की भूिम है, िजसके िक संदभर् में थानाध्यक्ष दिरयाबाद द्वारा यह आख्या िदनांिकत 20.02.1994 को प्रस्तुत की गयी है िक "िववािदत जमीन िवपक्षी के मकान व सहन के दिक्षण है िजसपर िवपक्षी का ही कब्जा होना पाया गया। िववािदत जमीन पर एक नीम का पेड़, चरही, मड़हा, जानवरों का बना है िजसपर िवपक्षी का ही कब्जा बताया गया है। आवेदक का कहना गलत है िक िववािदत जमीन पर िवपक्षी का कब्जा नहीं है जबिक सत्य यह है िक िवपक्षी पहले से ही उस जमीन पर कािबज है।" पुनश्च थानाध्यक्ष दिरयाबाद द्वारा प्रस्तुत आख्या िदनांक 22.02.1995 में यह उल्लेख है िक, "िववािदत जमीन िजसका िववाद अम्बर लाल व रामबरन के मध्य चल रहा है, िजसकी मौके पर जांच बाद पाया गया िक िववािदत भूिम पर 02 नांदे जो प्रचिलत है वह रामबरन की बनी हुई है इसके अितिरक्त कन्डे का ढेर भी रामबरन का लगा हुआ है। एक पेड़ भी नीम का मौजूद है िजसका िववाद उभय पक्षों के मध्य चल रहा है िजसको लेकर उभय पक्षो के मध्य िदनांक 02.10.1994 को मारपीट हो चुकी है। िजसका थाना स्थानीय पर उभय पक्षो के िवरूद्ध धारा 323, 504 का अिभयोग पंजीकृ त होकर आरोप पत्र न्यायालय पर प्रेिषत िकया गया है।"
9.4 प्रस्तुत मामले में प्रथम पक्ष अम्बर लाल ने िवचारण न्यायालय के समक्ष अपने सशपथ बयान में यह भी कहा गया है िक "जो दीवानी न्यायालय का मुकदमा चल रहे है, वह उसमें प्रथम पक्ष है।"
10.1 प्रस्तुत िनगरानी के संदभर् में अमरेश ितवारी बनाम लालता प्रसाद दूबे (2000) 4 एससीसी 440 के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय की 3 न्यायमूतीर्गण की पीठ द्वारा पािरत िविध व्यवस्था को दृिष्टगत रखना होगा,िजसमें Ram Sumer Puri Mahant V. State of U.P. and others (1985) 1 SCC 427 के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पूवर् में दी गयी िविध व्यवस्था का हवाला देते हुये यह व्यवस्था दी गयी है िक, 'जहां सक्षम दीवानी न्यायालय में वादग्रस्त सम्पित्त के कब्जे अथवा उसके स्वत्व की उद्घोषणा के संदभर् में वाद दायर िकया जा चुका हो, तो ऐसी िस्थित में धारा 145 दं०प्र०सं० के अन्तगर्त कायर्वाही अग्रसािरत नहीं होना चािहये,' िकन्तु िनगरानीकतार् की ओर से माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा, प्रकाशचन्द्र सचदेव बनाम स्टेट आिद एआईआर 1994 सुप्रीमकोटर् 1436 के मामले में दी गयी िविध व्यवस्था प्रस्तुत की गयी, िजसमें माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा यह भी व्यवस्था दी गयी है िक 'जहां िसिवल न्यायालय द्वारा िदये गये यथािस्थित का आदेश उभय पक्ष के मध्य शािन्त व्यवस्था बनाये रखने हेतु पयार्प्त नहीं है, अथवा जहां िसिवल न्यायालय द्वारा कब्जे के िबन्दु को समुिचत रूप से व्यवहृत नहीं िकया गया है, वहां धारा 145 दं०प्र०सं० के अन्तगर्त संबंिधत मिजस्ट्रेट को कायर्वाही करने का अिधकार प्राप्त है।' इसी िबन्दु पर िनगरानीकतार् की ओर से माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद की अद्यतन व्यवस्था IRFAN ALI V. STATE OF U.P. and others [2024(127)ACC596] का भी हवाला िदया गया है, िजसमें यह व्यवस्था दी गयी है िक, 'जहां िसिवल न्यायालय द्वारा कोई अंतिरम आदेश पािरत नहीं िकया गया हो अथवा के वल यथािस्थित बनाये रखने का आदेश पािरत िकया गया हो, वहां धारा 145 दं०प्र०सं० के अन्तगर्त कायर्वाही अग्रसािरत की जा सकती है।'
10.2 िनगरानीकतार् की ओर से माननीय उच्च न्यायालय, इलाहाबाद की एक अन्य व्यवस्था, Bharwal Prasad Vs. IlAddl.District and Session Judge Sihdharthnagar, RR 1985 Page 55 प्रस्तुत की गयी है। उक्त िनणर्य में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा यह व्यवस्था दी गयी है िक 'धारा 145 (1) दं०प्र०सं० के मामले में पुिलस िरपोटर् का उद्देश्य यह है िक क्या प्रस्तुत मामले में शािन्त भंग होने की संभावना िवद्यमान है। यह पुिलस िरपोटर् िकसी व्यिक्त के कब्जे की जांच के संदभर् में नहीं होती क्योंिक इस हेतु पक्षकार को अपने साक्ष्य के जिरये अपने कब्जे को सािबत करना होता है। मेरे द्वारा माननीय उच्च न्यायालय की उक्त िविध व्यवस्था का भी सम्मानपूवर्क अवलोकन िकया। 5 A227 No. 6742 of 2025
10.3 िनगरानीकतार् की ओर से माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद की खंडपीठ की व्यवस्था, SATYA NARAIN V. STATE OF U.P.(ALLAHABAD HIGHCOURT) 1997 (35) इस िबन्दु पर प्रस्तुत की गयी है िक 'यिद संबंिधत अधीनस्थ न्यायालय द्वारा धारा 145 (6) दं०प्र०सं० के अन्तगर्त िदया गया अिभमत िवसंगित एवं मूल र्ल्यांिकत कर सकती है।' रूप से त्रुिटपूणर् या िकसी िविधक नुक्स से ग्रिसत हो, तो िनगरानी न्यायालय साक्ष्य को पुनमू मेरे द्वारा माननीय उच्च न्यायालय की उक्त िविध व्यवस्था का भी सम्मानपूवर्क अवलोकन िकया।
10.4 िनगरानीकतार् की ओर से माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद (लखनऊ खंडपीठ) की एक अन्य व्यवस्था, RAJENDRA PRATAP SINGH V. DISTRICT AND SESSIONS JUDGE GONDA AND OTHERS 1994 Page 398 इस िबन्दु पर प्रस्तुत की गयी है िक, 'धारा 145 दं०प्र०सं० की कायर्वाही एक तरफा पुिलस िरपोटर् पर िक, 'शािन्त भंग की आशंका नहीं है, के आधार पर समाप्त नहीं की जा सकती। मेरे द्वारा माननीय उच्च न्यायालय की उक्त िविध व्यवस्था का भी सम्मानपूवर्क अवलोकन िकया।
10.5 िनगरानीकतार् की ओर से माननीय उच्च न्यायालय उड़ीसा की व्यवस्था, Sanat Kumar Patnaik V. Binoy Kumar Nayak and another, 1999 CRI.L.J.351 इस िबन्दु पर प्रस्तुत की गयी िक, 'यिद एक बार िनगरानी ग्राह्य हो जाती है तब वह गुण दोष पर ही िनणीर्त होगी, बल ना िदये जाने के आधार पर िनणीर्त नहीं हो सकती। मेरे द्वारा माननीय उच्च न्यायालय की उक्त िविध व्यवस्था का भी सम्मानपूवर्क अवलोकन िकया गया।
11.1 प्रश्नगत आक्षेिपत आदेश मुख्य रूप से दो िबन्दुओं पर पािरत िकया गया है, प्रथम यह िक, िवचारण न्यायालय द्वारा प्रश्नगत भूिम पर प्रथम दृष्टया िवपक्षी का कब्जा पाया गया है, िद्वतीय यह िक, प्रश्नगत भूिम आबादी की होने एवं भूिम तथा उसमें लगे पेड़ के स्वािमत्व का मूल िववाद होने के कारण धारा 145 दं०प्र०सं० के अन्तगर्त उक्त भूिम व नीम के पेड़ पर उभय पक्ष के स्वािमत्व का िनधार्रण सक्षम िसिवल न्यायालय द्वारा ही िकया जा सकने, के आधार पर धारा 145 दं०प्र०सं० की कायर्वाही को समाप्त की गयी है।
11.2 उक्त आक्षेिपत िनणर्य से यह स्पष्ट है िक उभय पक्ष के मध्य लगभग 30 वषोर्ं से अिधक समय से चकबंदी न्यायालय एवं आपरािधक न्यायालय तथा िसिवल न्यायालय में िविभन्न वाद चल रहे हैं। यिद िनगरानीकतार् का प्रश्नगत भूिम एवं नीम के पेड़ पर स्वािमत्व एवं कब्जा था, तो उसके पास वह प्रत्येक अवसर था, िक वह इस 30 वषर् के दौरान िसिवल न्यायालय से प्रश्नगत भूिम पर अपने स्वािमत्व एवं कब्जे की उद्घोषणा के संदभर् में अनुतोष प्राप्त कर िववाद को सदैव के िलये समाप्त करा लेवे, िकन्तु वह लगातार धारा 145 दं०प्र०सं० की कायर्वाही लगभग 30 वषोर्ं से अग्रसािरत िकये हुये है, िजसमें िक, उसके द्वारा पूवर् में 145 दं०प्र०सं० के दो प्राथर्नापत्र, िजनका िक ऊपर उल्लेख िकया गया है, वह इसी सम्पित्त के संदभर् में थे, िनरस्त िकये जा चुके हैं एवं उनकी िनगरानी भी सत्र न्यायालय द्वारा िनरस्त िकया जाना बताया गया है। अतः इस प्रकार स्पष्ट होता है िक िनगरानीकतार्/प्राथीर् धारा 145 दं०प्र०सं० के अन्तगर्त दी गयी िविधक प्रिक्रया का दुरूपयोग करते हुये एवं प्रश्नगत भूिम के स्वत्व एवं कब्जे के प्रश्न को अनुत्तिरत रखे जाने के आशय से, प्रश्नगत सम्पित्त के संदभर् में शािन्त व्यवस्था भंग होने के आधार पर धारा 145 दं०प्र०सं० की कायर्वाही कर उक्त िववाद को अिनिश्चतकाल के िलये लंिबत रखना चाहता है, जोिक ना तो धारा 145 दं०प्र०सं० की मंशा है और ना ही यह न्याय की मंशा है िक वह िकसी व्यिक्त को यह छू ट प्रदान करें िक वह समुिचत िविधक प्रिक्रया को ना अपनाते हुये िकसी अन्य िविधक प्रिक्रया का दुरूपयोग कर, ना के वल िकसी सम्पित्त के िववाद को अिनिश्चतकाल तक लंिबत रखे वरन अपने उक्त आचरण के द्वारा वह दूसरे पक्ष को शािन्त व्यवस्था भंग करने के िलये प्रकोिपत करे। अस्तु उक्त तथ्यों एवं पिरिस्थितयों में िनगरानीकतार् अपने द्वारा प्रस्तुत माननीय उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय की उक्त िविध व्यवस्थाओं का लाभ अपने पक्ष में पाने का अिधकारी नहीं है।
11.3 अस्तु उक्त तथ्यों एवं पिरिस्थितयों एवं साक्ष्यों के िववेचन के पश्चात् माननीय उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय की उक्त िविध व्यवस्थाओं के आलोक में यह न्यायालय इस िनष्कषर् की है िक, िवद्वान िवचारण न्यायालय द्वारा उक्त आक्षेिपत आदेश पािरत करने में कोई िविधक त्रुिट या कोई अिनयिमतता नहीं की गयी है, िजससे िक िनगरानी में िदये गये िकसी भी आधार पर आलोच्य आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई औिचत्य हो, पिरणामतः िवद्वान अवर न्यायालय द्वारा पािरत आक्षेिपत िनणर्य व आदेश िदनांिकत 17.10.2023 पुष्ट िकये जाने योग्य है। फलस्वरूप िनगरानीकतार् की प्रस्तुत िनगरानी बलहीन होने के कारण िनरस्त िकये जाने योग्य है। आदेश तदनुसार िनगरानीकतार् की प्रस्तुत िनगरानी संख्या 07/2024 िनरस्त की जाती है। पिरणामस्वरुप अवर न्यायालय के द्वारा पािरत उक्त आक्षेिपत िनणर्य एवं आदेश िदनॉिकत 17.10.2023 पुष्ट िकया जाता है। िनणर्य की एक प्रित मय अवर न्यायालय की पत्रावली अिवलम्ब प्रेिषत की जाये। बाद आवश्यक कायर्वाही पत्रावली अिभलेखागार संग्रिहत हो। िलिपक िनयमानुसार आवश्यक कायर्वाही सुिनिश्चत करें।"
4. Considered the aforesaid as also the submissions advanced by the learned counsel for the parties, material available on record and also the report(s) 6 A227 No. 6742 of 2025 dated 20.02.1994 submitted by the SHO, Dariyabad, Barabanki and 22.02.1995 submitted by Nayab Tehsildar, Dariyabad, Barabanki and also various pronouncements on the issue related to Section 125 CrPC.
5. Upon due consideration of aforesaid, this Court is of the view that no interference is required in the matter. It is for the following reason(s):- (i) The report dated 20.02.1994 on record indicates that on the disputed land side opposite was in possession. (ii) Subsequent report dated 22.02.1995 also indicates that side opposite was in possession. (iii) The report of the Nayab Tehsildar, Dariyabad, Barabanki dated
22.02.2018 indicates that the dispute between the parties relates to a peace of land and there is apprehension of breach of peace. (iv) The private opposite parties are blood relatives of the petitioner who initiated the proceedings in terms of Section 125 CrPC. (v) The aforesaid indicates that at the time of initiation of proceedings under Section 125 CrPC the private opposite parties were in possession of the property in issue. (vi) It is not the case of the petitioner that he was wrongfully dispossessed within two months next before the date of initiation of proceedings under Section 145 CrPC.
6. For the reasons aforesaid, the petition is liable to be dismissed. It is accordingly dismissed. November 20, 2025 Vinay/- (Saurabh Lavania,J.)